रिश्ते की सीमा

कुछ बातें, कहकर, नही, कहीं जातीं,
कुछ बातें सुनकर, नही, समझी जातीं,

कहने और सुनने के,
समझने के, अंतर को,
अपनी बुद्धि से कम करना होगा,

बिन कही बातों को,
बिन सुनकर,
समझना होगा,

कुछ रेखाएँ, सीमाओं की,
बिन खीचें,
माननी होंगी,

मर्यादायों के बंधन को,
बिन बाँधे, 
बाँधना होगा,

हर रिश्ते की हद को,
बिना कहे,
हद मे रहना होगा

हर रिश्ते को उसका,
सही नाम,
मान देना होगा…

जो कह कर ना हो सके,
उसे समझकर,
करना होगा,

हर रिश्ते की सीमा मे,
हम सबको रहना होगा….

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हो सके तो, लेती आना….

मैं यहाँ बहुत दूर हूँ घर से,
सात समंदर पार हूँ जब से,
ना सौंधी मिट्टी की खुशबू पाती हूँ,
ना नीले आसमान का आँचल पाती हूँ,

पापा का आँगन, दूर है जब से,
माँ आँचल, सिर पर ना जब से,
अपने आँगन मे, रेखा ना कोई पाती हूँ,
माँ के प्यार को बस, अपने मन मे ही, निधि पाती हूँ,

ना माँ के हाथ का खाना है,
ना पापा की, प्यार भरी नसीहत है,
सब कुछ, खाली-खाली और कम सा है,

तुम आते-आते, हो सके तो, लेती आना….
इनमे से, किसी, एक का भी, आधा सा ही, अपना-पन लेती आना…

 

तीस की उमर,सोलह की तरह जानी…(नया साल 2010)

नये साल मे, सब कुछ नया है,
हमने भी कुछ, नया करने की ठानी,
तीस की उमर को,
सोलह की तरह जानी…

दिल तो आसानी से,
सोलह का हो गया,
रही- सही कसर,
चेहरे के लिए और शरीर के लिए जानी…

सारे जतन करने के लिए,
कमर हमने बँधी…

बालों की सफेदी,
कलर से उड़ा दी,
चेहरे की लालिमा,
फेशियल से चमका ली,
जो बची थी कसर,
कपड़ों से जमा ली,

और

रिंकल क्रीम लगा ली,
फेस लिफ्टिंग की भी ठान ली,
योगा /वर्ज़िश सब मे हाथ साफ कर डाला,
अपनी अदाओ मे भी नया हुनर डाला…

अपने को रूपमति माना और जाना…

१०, १५ दिनो मे जब,
बलों की सफेदी लहराई,
फेशियल की लालिमा,
झुर्रियों ने छुपाई,
योगा और वर्ज़िश ने जब,
अपनी अकड़न दिखलाई,

सोलह साल की असली,
रौनक-चमक हमको याद आई,
अपनी उमर की गरिमा और महिमा,
माँ के रूप मे सामने आई…

नये साल मे कुछ अलग और बेमिसाल करना है,
ये बात हमारे सामने आई…

टूटे-छूटे बिखरे-सिमटे पल

फिर खोज रही हूँ,
वो टूटे-छूटे, बिखरे-सिमटे पल,

जिनको हमने जाने मे,
कभी अनजाने मे,
छुपा दिया था,
कभी आँसू मे,
कभी मुस्कान मे,

वो हर एक पल,
कुछ कह रहा है,
कभी ज़ोर से,
कभी चुपके से,

कुछ आवाज़े जो हल्की है,
उनको फिर से, ज़ोर से सुनना है,
जो, ज़ोरों से कनों से टकराती है,
उनको हल्का करना है,

तुम साथ हो निधि के ,
इसलिए..
बिखरे पलों को समेटना है…
मेरी उलझनों को,
तुम्हारे हाथो से, सुलझना है…
क्योंकि…
उन टूटे-छूटे, बिखरे-सिमटे पलों को,
प्यार मे बदलना है…  

श्वेत मखमली चादर मे…

फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे,
एक ही रंग दिखता है,
श्वेत-श्याम एक-दूजे संग,
देखो कितना जचता है…

एक रंग मुझे, बंद आँखों से भी,
स्पष्ट दिखता जाता है,
सारे रंगों को जो,
फीका करता जाता है,

जब सुर्ख लाल रंग,
तुम्हारे प्यार का,
श्वेत मखमली चादर मे,
फैला-बिखरा सजता है…

श्वेत-श्याम एक ही, होकर…
सुर्ख लाल मे, छिपता है…
फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे…
एक ही सिंदूरी रंग दिखता है…

नवयुवती

सड़क के गढ्ढों मे, डोलता हुआ, आटो चला जा रहा था,
एक स्टॉप मे, नवयुवती के चढ़ते ही, सारी नज़रे उस पर टिक गयी,

कुछ मनचलों ने, दो-चार ओछे शब्द उस पर गढ़ दिए,
जो ना बोल पा रहे थे, उनकी  नज़रों ने ही, शब्दों को  गढ़ दिया,

थोड़ी ही दूर पर, एक बाईक, ऑटो के साथ हो ली,
माज़रा  समझते देर ना लगी, 

आटो के सामने, उन मनचलो ने, गाड़ी अड़ा दी,
चालक के,  ऑटो रोकते ही, लड़ाकों ने लड़की को खीचने की कोशिश की,

ऑटो वाले ने हाथ जोड़कर लड़की से कहा,
बेटी मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, रोज़ रोज़ के तुम्हारे इस अपमान से, मरणासन्न हो रहा हूँ,

जवान लड़के ही क्या, औरते भी तुझे साथ नही देती है,
अच्छा होता जो, तू बीमार माँ की, दावा और भाई की पढ़ाई के लिए,  इनके बाप से, उधार ना लेती,

हर किसी को, तुझमे ही बुराई नज़र आती है,
क्योंकि तू, जवान सुंदर लड़की, इनकी बेटी या बहन नही, पराई है,

तुझे सब ताने मार जाते है, नज़रों से तेरा चरित्र गिरा जाते है,
इन मनचलों के, इरादों को, बुलंदी दे जाते है,

एक आवाज़ भी तेरी, तरफ नही उठती है, 
तू ,रोज़ रोज़ ये अपमान,  कैसे सहती है?

लड़की ने उतरते हुए भी कुछ ना कहा,
एक क्रोध भरी नज़रों से, सबको देखा,

जो नज़रें उसे ताने मार रही थीं,
मानों धरती मे दबी जा रही थीं,

बिन कहे ही, उसकी नज़रों ने, हम सबको पानी कर दिया,
उसकी तीखी मुस्कान ने, हम सबको बेज़ुबान कर दिया…

-एक दिए की रौशनी तले- (दीपावली त्यौहार)

दीपावली की रात… एक घर मे…

छोटी-छोटी बेटियाँ, माँ का हाथ बटा रही है,
घर मे रंग-रोगन कर, पकवान बना रही है,

बेटा रात मे जुआ खेलते पकड़ा गया है,
पिता से, जेल के, चक्कर कटवा रहा है,

बहू को, पहली ही दीपावली मे,
दहेज के नाम, पटाखों के हवाले कर दिया है,

दीपावली रौशनी का त्यौहार है,
हम सबने साबित कर दिया….

किसी घर से, मीठे के डब्बे, बासे होने पर, फेंके गये,
कोई, कई रातों बाद, आज भी, भूखा सोया है,

किसी घर बच्चो ने ३,४ जोड़ी कपड़े बदले थे,
किसी के तन मे आज भी, चिथड़े नही थे,

किसी अमीर ने आज, कुत्ते का घर भी सजाया,
किसी ग़रीब की, बरसों से टूटी झोपड़ी मे, आज भी अंधेरा छाया है ,

दीपावली रौशनी का त्यौहार है,
हम सबने साबित कर दिया….

कोई बहुत खुश है की, बेटी टी.वी. मे आ रही है,
तो क्या, अंगप्रदर्शन, गाली- गलौच कर पैसे कमा रही है,

कोई बहुत खुश है की, बेटा विदेश मे नौकरी कर, नाम कमा रहा है,
तो क्या, बरसों से, दीपावली मे रुपये भेज कर, कर्तव्य निभा रहा है,

नाती-पोते दीपावली मे, महँगे उपहार माँगते है,
एक दिन दीपावली मना, बूढ़ो से निजात पाते है,

दीपावली रौशनी का त्यौहार है,
हम सबने साबित कर दिया….

हे लक्ष्मी मैय्या! तू हर बार “निधि” को जीवन के, नये रूप दिखाती है,
एक दिए की रौशनी तले, कितना अंधेरा है, तू समझा जाती है…