हे नीर !  

हे नीर !

“माँ” कहा तुझको हमने,

जीवन दान लिया हमने !

बहाकर अपने, पापों को, तुझमे !

जीवन का उध्धार किया, सबने !

“माँ” है, तू !

पाप हमारे लेती रही,

हमको जीवन देती रही !

अपना मैला तन- मन, तुझमे हम सब धोतेरहे!

तेरे आँचल को हम सब, बंज़र- सूखा करते रहे!

तेरी कृष काया पे, जीवन के नये अंकुर,

कैसे रोपे हम?

तुझको कैसे बचा सके “निधि” सोचे यह?

एक सार्थक प्रयास हमारा,

तेरा आशीर्वाद दे जाएगा,

जीवन के नये रूप,

जल, थल, गगन को दे जाएगा !

जीवन का अमृत, नीर !

जीवन का सरगम सुनाएग !

तेरे आँचल मे माँ !

सरल, सुलभ, सुंदर जीवन राग

फिर गुनगुनाएगा !

14/4/18

7am-9am

#Join our hands together to save

#NallagandalaLakeHyderabad

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रिश्ते की सीमा

कुछ बातें, कहकर, नही, कहीं जातीं,
कुछ बातें सुनकर, नही, समझी जातीं,

कहने और सुनने के,
समझने के, अंतर को,
अपनी बुद्धि से कम करना होगा,

बिन कही बातों को,
बिन सुनकर,
समझना होगा,

कुछ रेखाएँ, सीमाओं की,
बिन खीचें,
माननी होंगी,

मर्यादायों के बंधन को,
बिन बाँधे, 
बाँधना होगा,

हर रिश्ते की हद को,
बिना कहे,
हद मे रहना होगा

हर रिश्ते को उसका,
सही नाम,
मान देना होगा…

जो कह कर ना हो सके,
उसे समझकर,
करना होगा,

हर रिश्ते की सीमा मे,
हम सबको रहना होगा….

हो सके तो, लेती आना….

मैं यहाँ बहुत दूर हूँ घर से,
सात समंदर पार हूँ जब से,
ना सौंधी मिट्टी की खुशबू पाती हूँ,
ना नीले आसमान का आँचल पाती हूँ,

पापा का आँगन, दूर है जब से,
माँ आँचल, सिर पर ना जब से,
अपने आँगन मे, रेखा ना कोई पाती हूँ,
माँ के प्यार को बस, अपने मन मे ही, निधि पाती हूँ,

ना माँ के हाथ का खाना है,
ना पापा की, प्यार भरी नसीहत है,
सब कुछ, खाली-खाली और कम सा है,

तुम आते-आते, हो सके तो, लेती आना….
इनमे से, किसी, एक का भी, आधा सा ही, अपना-पन लेती आना…

 

तीस की उमर,सोलह की तरह जानी…(नया साल 2010)

नये साल मे, सब कुछ नया है,
हमने भी कुछ, नया करने की ठानी,
तीस की उमर को,
सोलह की तरह जानी…

दिल तो आसानी से,
सोलह का हो गया,
रही- सही कसर,
चेहरे के लिए और शरीर के लिए जानी…

सारे जतन करने के लिए,
कमर हमने बँधी…

बालों की सफेदी,
कलर से उड़ा दी,
चेहरे की लालिमा,
फेशियल से चमका ली,
जो बची थी कसर,
कपड़ों से जमा ली,

और

रिंकल क्रीम लगा ली,
फेस लिफ्टिंग की भी ठान ली,
योगा /वर्ज़िश सब मे हाथ साफ कर डाला,
अपनी अदाओ मे भी नया हुनर डाला…

अपने को रूपमति माना और जाना…

१०, १५ दिनो मे जब,
बलों की सफेदी लहराई,
फेशियल की लालिमा,
झुर्रियों ने छुपाई,
योगा और वर्ज़िश ने जब,
अपनी अकड़न दिखलाई,

सोलह साल की असली,
रौनक-चमक हमको याद आई,
अपनी उमर की गरिमा और महिमा,
माँ के रूप मे सामने आई…

नये साल मे कुछ अलग और बेमिसाल करना है,
ये बात हमारे सामने आई…

टूटे-छूटे बिखरे-सिमटे पल

फिर खोज रही हूँ,
वो टूटे-छूटे, बिखरे-सिमटे पल,

जिनको हमने जाने मे,
कभी अनजाने मे,
छुपा दिया था,
कभी आँसू मे,
कभी मुस्कान मे,

वो हर एक पल,
कुछ कह रहा है,
कभी ज़ोर से,
कभी चुपके से,

कुछ आवाज़े जो हल्की है,
उनको फिर से, ज़ोर से सुनना है,
जो, ज़ोरों से कनों से टकराती है,
उनको हल्का करना है,

तुम साथ हो निधि के ,
इसलिए..
बिखरे पलों को समेटना है…
मेरी उलझनों को,
तुम्हारे हाथो से, सुलझना है…
क्योंकि…
उन टूटे-छूटे, बिखरे-सिमटे पलों को,
प्यार मे बदलना है…