श्वेत मखमली चादर मे…

फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे,
एक ही रंग दिखता है,
श्वेत-श्याम एक-दूजे संग,
देखो कितना जचता है…

एक रंग मुझे, बंद आँखों से भी,
स्पष्ट दिखता जाता है,
सारे रंगों को जो,
फीका करता जाता है,

जब सुर्ख लाल रंग,
तुम्हारे प्यार का,
श्वेत मखमली चादर मे,
फैला-बिखरा सजता है…

श्वेत-श्याम एक ही, होकर…
सुर्ख लाल मे, छिपता है…
फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे…
एक ही सिंदूरी रंग दिखता है…

नवयुवती

सड़क के गढ्ढों मे, डोलता हुआ, आटो चला जा रहा था,
एक स्टॉप मे, नवयुवती के चढ़ते ही, सारी नज़रे उस पर टिक गयी,

कुछ मनचलों ने, दो-चार ओछे शब्द उस पर गढ़ दिए,
जो ना बोल पा रहे थे, उनकी  नज़रों ने ही, शब्दों को  गढ़ दिया,

थोड़ी ही दूर पर, एक बाईक, ऑटो के साथ हो ली,
माज़रा  समझते देर ना लगी, 

आटो के सामने, उन मनचलो ने, गाड़ी अड़ा दी,
चालक के,  ऑटो रोकते ही, लड़ाकों ने लड़की को खीचने की कोशिश की,

ऑटो वाले ने हाथ जोड़कर लड़की से कहा,
बेटी मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, रोज़ रोज़ के तुम्हारे इस अपमान से, मरणासन्न हो रहा हूँ,

जवान लड़के ही क्या, औरते भी तुझे साथ नही देती है,
अच्छा होता जो, तू बीमार माँ की, दावा और भाई की पढ़ाई के लिए,  इनके बाप से, उधार ना लेती,

हर किसी को, तुझमे ही बुराई नज़र आती है,
क्योंकि तू, जवान सुंदर लड़की, इनकी बेटी या बहन नही, पराई है,

तुझे सब ताने मार जाते है, नज़रों से तेरा चरित्र गिरा जाते है,
इन मनचलों के, इरादों को, बुलंदी दे जाते है,

एक आवाज़ भी तेरी, तरफ नही उठती है, 
तू ,रोज़ रोज़ ये अपमान,  कैसे सहती है?

लड़की ने उतरते हुए भी कुछ ना कहा,
एक क्रोध भरी नज़रों से, सबको देखा,

जो नज़रें उसे ताने मार रही थीं,
मानों धरती मे दबी जा रही थीं,

बिन कहे ही, उसकी नज़रों ने, हम सबको पानी कर दिया,
उसकी तीखी मुस्कान ने, हम सबको बेज़ुबान कर दिया…

एक बचपन उसने जिया (बाल दिवस विशेष)

एक कमरा सपनो  भरा,
फर्श मखमली, छत सितारों भरीं,
दीवारें रंगों सजीं, खिड़कियाँ फूलों रंगीं,

सपने कहीं उँचे की, आकाश भी कम लगे,
ज़मीन कहीं मखमली की, बाल भी शूल लगे,
एक बचपन उसने जिया, जिसे सब कुछ कम लगा,

एक कमरा, कुछ टूटी-मूटी, सीकचों से बना,
फर्श चुभता, बहती-रिसती छत,
दीवारें उधड़ी, रंग बही, खिड़कियाँ शूलों सजीं,

सपने बस इतने की, आकाश तले छाँव मिले,
ज़मीन बस इतनी रहे, की पैरों तले से  न हटे,
निधि “एक बचपन उसने  भी जिया, जिसे कभी कुछ भी ना मिला….

 

तुम

तुम बहुत मीठा बोलते हो,
हर शब्द को, चाशनी मे घोलते हो,
मिशरी की तरह, रस घोलते हो,

न कड़वा बोलते हो,
न शब्दों के तीर चलाते हो,
बिन कुछ बुरा कहे ही,

मीठे शब्दों मे ही,
कड़वा सच सुनाते हो,

अब

1) पहले :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
तुम मेरे दिल तक आए,
कुछ यूँ समाए की,
दूजी, सारी दस्तकें, सारी आहटें,
मुझसे कोसों परें हो गयीं…

2) कुछ दिन पहले तक :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
मुझसे दूर हुए, दूर भी इतने की,
दूजी, हर दस्तक, हर आहट,
मेरे कानों मे गूंजा करती,
तुम्हारी दस्तक, तुम्हारी आहट नही,
ये कहा करती थी….

3) अब:-
ना दस्तक, ना आहट है,
ना दरवाज़े पर नज़रे टिकी है,
ना किसी आवाज़ की पुकार है,