एक बचपन उसने जिया (बाल दिवस विशेष)

एक कमरा सपनो  भरा,
फर्श मखमली, छत सितारों भरीं,
दीवारें रंगों सजीं, खिड़कियाँ फूलों रंगीं,

सपने कहीं उँचे की, आकाश भी कम लगे,
ज़मीन कहीं मखमली की, बाल भी शूल लगे,
एक बचपन उसने जिया, जिसे सब कुछ कम लगा,

एक कमरा, कुछ टूटी-मूटी, सीकचों से बना,
फर्श चुभता, बहती-रिसती छत,
दीवारें उधड़ी, रंग बही, खिड़कियाँ शूलों सजीं,

सपने बस इतने की, आकाश तले छाँव मिले,
ज़मीन बस इतनी रहे, की पैरों तले से  न हटे,
निधि “एक बचपन उसने  भी जिया, जिसे कभी कुछ भी ना मिला….

 

तुम

तुम बहुत मीठा बोलते हो,
हर शब्द को, चाशनी मे घोलते हो,
मिशरी की तरह, रस घोलते हो,

न कड़वा बोलते हो,
न शब्दों के तीर चलाते हो,
बिन कुछ बुरा कहे ही,

मीठे शब्दों मे ही,
कड़वा सच सुनाते हो,

अब

1) पहले :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
तुम मेरे दिल तक आए,
कुछ यूँ समाए की,
दूजी, सारी दस्तकें, सारी आहटें,
मुझसे कोसों परें हो गयीं…

2) कुछ दिन पहले तक :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
मुझसे दूर हुए, दूर भी इतने की,
दूजी, हर दस्तक, हर आहट,
मेरे कानों मे गूंजा करती,
तुम्हारी दस्तक, तुम्हारी आहट नही,
ये कहा करती थी….

3) अब:-
ना दस्तक, ना आहट है,
ना दरवाज़े पर नज़रे टिकी है,
ना किसी आवाज़ की पुकार है,

मैं अपने मन की राह चुनूंगीं

मैने कयी बार,
कभी अपनों के,
कभी तुम्हारे कहने पर,

नयी सुबह का इंतज़ार किया,
नयी माला मे फूल गुथे,
नयी रंगों की रंगोली भरी,
नयी खुशबू से घर महकाया,

नयी सुबह जब भी आई,
पूरानी काली रातों की,
छीनी ही सही, चादर ओढ़ के आई,

नयी माला के फूल,
कुछ पल मुस्कुराकर,
मुरझा जाते है, शाम तलक़,

नयी रंगों की रंगोली,
रंगों को बेरंग कर,
बिखरती है, कुछ ही पल मे,

नयी खुशबू घर को मेरे,
महकाकर, सारे कोने,
हवा हो जाती है, पल भर मे,

अब ना अपनो की, ना तुम्हारी सुनूँगी,
मैं अपने मन की राह चुनूंगीं,

जब भी सुबह आएगी,
नयी माला तुझको अर्पण करूँगी,
एक ही रंग की, रंगोली बनाकर,
सच्ची खुशबू- सच्चे रंगो से,
अपने घर-जीवन को भरूँगी,

वो सुबह ही, मेरी होगी,
वो माला की, भीनी खुशबू,
वो रंगोली का, एक ही रंग,
मेरे घर और जीवन को सजाएगा…

हाँ, “निधि”मन की राह चुनूंगीं,
ना अपनो की, ना तुम्हारी सुनूँगी 

कुछ पंक्तियाँ

चलते थे जिस ज़मीं पर, संभल संभल कर हम,
सरकी वही ज़मी  नये कदम उठाने के पहले,

आसमान से तो पानी बरसता था अक्सर,
आग ही बरसी जब हम निकले  बिन तैइय्यारी के,

रौशनी रहती थी हर रोज़ ही दिन मे,
ग्रहण ही लगा सूरज को जब  हम दिन मे निकले,

तेरे इंतज़ार मे…

हम तेरे इंतज़ार के आदि है,
ये जानकार तुम,
ना जाने कब तक इंतज़ार कारवाओगे?
इस इंतज़ार मे ही जीना है,
किस्मत हमारी.
ये मानकर तुम,
ता उम्र हमको सताओगे,
अब नही है शिकवा,
इस इंतज़ार से,
के जीना खुशी से है,
तेरे इंतज़ार मे…

 

– कहा करते थे –

1)
“वो”, मुझसे, बेइंतहाँ प्यार करता था,
ऐसा वो और लोग मुझसे कहा करते थे,
मेरे कारण उसके लबों मे हँसी,
और आँखों मे पानी आया करता था,
ये हम भी देखा करते थे…
उसे प्यार से हम, “पागल” कहा करते थे…
2)
हमने कुछ महसूस किया/कुछ नहीं किया,
उसको नाकार कर, बहुत सारी बातें समझाकर,
ये भी मानकर की, हमने उन्हे समझा दिया है,
“बेवफ़ाई” का बोझ भी अपने दिल से हटाकर,
और ये मानकर/मनाकर की,
समय के साथ, “वो पागल”… भी समझ जाएगा,
अपना दिल हल्का कर हम आगे चल दिए…
3)
“उससे”, मैं, बेइंतहाँ प्यार करती हूँ,
ऐसा मैं और मेरे जानने वाले, मुझसे कहा करते है,
उसके कारण मेरे लबों पे हँसी,
और आँखों मे पानी आता-जाता रहता है,
ये वो भी देखा करते है…
प्यार से मुझे, “पगली” कहते है…

वो बेचैनी, वो तड़प, वो दर्द, वो ग़म…
वो आँसू, वो जलन, वो चुभन, वो तपन…

हम भी महसूस करते है, न जीते है/न मरते है…
उस बिन मेरी साँसे,रुक जाएँगी,ये जाना/माना करते है…
4)
उसने कुछ महसूस किया/कुछ नहीं किया,
हमको नाकार कर, बहुत सारी बातें समझाकर,
ये भी मानकर की, उसने हमे समझा दिया है,
“बेवफ़ाई” का बोझ भी अपने दिल से हटाकर,
और ये मानकर/मनाकर की,
समय के साथ, “ये पगली”… भी समझ जाएगी,
अपना दिल हल्का कर वो आगे चल दिए…
5)
“वो” जो मुझसे बेइंतहाँ प्यार करता था,
उसका दर्द, मेरे दिल मे समझ आता है अब…
जब…
“उसने” जिसे मैं प्यार करती हूँ,
मेरे प्यार को नाकारा है अब…

एक ही आवज़ आती है हमेशा…

एक बार मिलूं उससे,
जिसे मैने ठुकराया था…

एक बार उसे भी ठोकर लगे,
जिसे मैने अपनाया है…

जो मुझको महसूस हुआ?
क्या???
वो, उनको भी महसूस होगा?

एक दूजे की…
बेचैनी, तड़प, दर्द, ग़म…
आँसू, जलन, चुभन, तपन…
को समझेंगें?

एक-दूजे से मिलकर, मुस्कुराकर, जीवन की राह मे, आगे चल देंगे?