एक बचपन उसने जिया (बाल दिवस विशेष)

एक कमरा सपनो  भरा,
फर्श मखमली, छत सितारों भरीं,
दीवारें रंगों सजीं, खिड़कियाँ फूलों रंगीं,

सपने कहीं उँचे की, आकाश भी कम लगे,
ज़मीन कहीं मखमली की, बाल भी शूल लगे,
एक बचपन उसने जिया, जिसे सब कुछ कम लगा,

एक कमरा, कुछ टूटी-मूटी, सीकचों से बना,
फर्श चुभता, बहती-रिसती छत,
दीवारें उधड़ी, रंग बही, खिड़कियाँ शूलों सजीं,

सपने बस इतने की, आकाश तले छाँव मिले,
ज़मीन बस इतनी रहे, की पैरों तले से  न हटे,
निधि “एक बचपन उसने  भी जिया, जिसे कभी कुछ भी ना मिला….

 

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छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

छोटे छोटे सपने थे,
पास मेरे सब अपने थे,
न थी चाह, आसमान मे उड़ाने की,
धरती ही मेरी अपनी थी,

बड़ा सोचो, बड़े सपने देखो,
जो चाह न मेरे अपनी थी,

जीना था, तो अपनो से लड़ना था,
जीतना था, तो अपना सब हराना था,
ये राह न मेरी अपनी थी,

सपने देखे, जिए और पूरे किए,
लड़ाई लड़ी और जीती भी,
राह मे आगे और आगे बढ़ गये,

थोड़ा ठहरकर जो सांस ली,
बड़े सपने, जो न दिल के थे,
सब पूरे हो गये,
छोटे सपने, जो दिल के अपने थे,
सब अधूरे रह गये,

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?
मेरे सब अपने कब दूर हो गये?
आसमान का तो कोई छोर नही,
पैरों के नीचे की धरती, भी खिसक गयी…

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

 

मैं अब जीने लगी हूँ…

कुतर दिए है, पंख अपने,
जिनसे उँची उड़ान भारी थी,
नील गगन मे, स्वच्छन्द उड़ चली थी,

तोड़ दिए है, सब सपने,
जिनमे सौ रंग भरे थे,

सपने सजाकर,
पंखों को पाकर,
दूर बहुत-दूर हो गयी थी, अपनो से,

न दुख की पुकार,
मुझ तक आती थी,
क्योंकि…सपनो मे ही खुश थी,

न छोटी-छोटी खुशियों मे,
अपनो संग हो पति थी,
क्योंकि…दूर उड़ चली थी,

रंगीन सपनो और उँची उड़ान के,
बोझ के तले, दबने-घुटने लगी थी,

अब…

वापस धरती मे चलने लगी हूँ,
सपनों से बाहर, सच की दुनियाँ मे जीने लगी हूँ,

अपनो के करीब आ गयी हूँ,
सुख मे सुखी और दुख मे दुखी होने लगी हूँ,

क्योंकि…

मैं अब जीने लगी हूँ…