मैं अपने मन की राह चुनूंगीं

मैने कयी बार,
कभी अपनों के,
कभी तुम्हारे कहने पर,

नयी सुबह का इंतज़ार किया,
नयी माला मे फूल गुथे,
नयी रंगों की रंगोली भरी,
नयी खुशबू से घर महकाया,

नयी सुबह जब भी आई,
पूरानी काली रातों की,
छीनी ही सही, चादर ओढ़ के आई,

नयी माला के फूल,
कुछ पल मुस्कुराकर,
मुरझा जाते है, शाम तलक़,

नयी रंगों की रंगोली,
रंगों को बेरंग कर,
बिखरती है, कुछ ही पल मे,

नयी खुशबू घर को मेरे,
महकाकर, सारे कोने,
हवा हो जाती है, पल भर मे,

अब ना अपनो की, ना तुम्हारी सुनूँगी,
मैं अपने मन की राह चुनूंगीं,

जब भी सुबह आएगी,
नयी माला तुझको अर्पण करूँगी,
एक ही रंग की, रंगोली बनाकर,
सच्ची खुशबू- सच्चे रंगो से,
अपने घर-जीवन को भरूँगी,

वो सुबह ही, मेरी होगी,
वो माला की, भीनी खुशबू,
वो रंगोली का, एक ही रंग,
मेरे घर और जीवन को सजाएगा…

हाँ, “निधि”मन की राह चुनूंगीं,
ना अपनो की, ना तुम्हारी सुनूँगी 

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छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

छोटे छोटे सपने थे,
पास मेरे सब अपने थे,
न थी चाह, आसमान मे उड़ाने की,
धरती ही मेरी अपनी थी,

बड़ा सोचो, बड़े सपने देखो,
जो चाह न मेरे अपनी थी,

जीना था, तो अपनो से लड़ना था,
जीतना था, तो अपना सब हराना था,
ये राह न मेरी अपनी थी,

सपने देखे, जिए और पूरे किए,
लड़ाई लड़ी और जीती भी,
राह मे आगे और आगे बढ़ गये,

थोड़ा ठहरकर जो सांस ली,
बड़े सपने, जो न दिल के थे,
सब पूरे हो गये,
छोटे सपने, जो दिल के अपने थे,
सब अधूरे रह गये,

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?
मेरे सब अपने कब दूर हो गये?
आसमान का तो कोई छोर नही,
पैरों के नीचे की धरती, भी खिसक गयी…

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

 

रूठों यूँ ना हमसे

रूठों यूँ ना हमसे,
ना जी पाएँगे
हँस के…

सज़ा यूँ ना दो हमे,
आँसू भी ना गिरे
पलक से…

राह देखते है तुम्हारी,
कुछ इस तरह 
हम कब से…

आँसू जो आए पालक पे,
तो धुंधला जाओगे हमसे

जो झपकेंगी पलकें,
ना चल दो तुम
पलट के…

शिकवा हो जो तुमको,
कह भी दो
अब हमसे…

चुप रह कर और छुपकर,
यूँ ना जीने दो हमे
तड़प के…

जाने हो जो दिल की,
हर एक बात
माफ़ भी कर दो हमे…