” माँ “

मेरी परम पूज्‍यनीय नानी.. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीमती सुशीला देवी दीक्षित को, मेरी माँ… श्रीमती छाया त्रिवेदी का श्रद्धासमर्पण…                           

                                                 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीमती सुशीला देवी दीक्षित    महाप्रायण १९ फ़रवरी २०१०


माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?
कैसे तुम्हारे गुण गाऊँ?
मन का चंदन, कर्म का अक्षत,
भावना के पुष्प चढ़ा,
साँसों का संगीत सुनाऊं,
माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?

सागर की स्याही बना,
आकाश की कलम से,
धरा मे ममता की कथा,
कैसे मैं लिख पाऊँ?
माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?

माँ तुम्हारे विश्वास का दीप,
अथक परिश्रम सूखा शरीर,
एक स्वप्न केवल तुम्हारा,
कैसे बच्चों का जीवन बनाऊँ?
माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?

अहर्निश बच्चों की चिंता,
ममता से सींचीं बगिया,
देख सब कुछ, सुख-दुख,
ईर्ष्या, द्वेष, राग, अनुराग,
छीनता जीवन, टूटते रिश्ते,
पल पल की पीड़ा तुम्हारी,
कैसे मैं भूल पाऊँ?
पाषण भी पिघल जाए,
वो गाथा कैसे सुनाऊं?
माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?

मन मे राम, हाथ मे काम,
अथक परिश्रम से सँवरा,
घर वो प्यारा,
हर्षोल्लास के   छण मे,
तुम जब खुश हो जाती,
दे आशीष सदा,
अम्रत रस लुटाती,
द्रवित होता जब मन तुम्हारा,
आह भी तुम ले ना पाती,
माँ तुम्हारे दुख तक,
कैसे मैं पहुँच पाऊँ?
माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?

कैसे मैं अनमोल धन का,
रिन चुकाऊं?

माँ तुम्हारे रूप मे,बेटी को मैं पाऊँ?
दर्द तुम्हारा कैसे मनाऊ?
माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?

धवल केश कंपित गात,
मात्र मूरत की झुर्रियों मे,
छाया प्रतिदिन,
प्रभु दर्शन पाऊँ?

माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?
माँ तुम्हे कैसे मनाऊँ?
                                                                                                                             

                                                                                                       द्वारा  श्रीमती छाया त्रिवेदी

स्त्री की परीक्षा लेनी हो…

हर बार क्यों लक्षमण रेखा खिचाती है?
हर बार क्यों अग्नि परीक्षा होती है?

जब राम ही नही है आज यहाँ?
फिर सीता की इच्छा क्यों होती है?

हर बार जब स्त्री की परीक्षा लेनी हो
वो राम का रूप क्यों धरता है?

याद रखे हर वो पुरुष
जो सीता की इच्छा रखता है
 
 
 
 
 
 
राम भी तुम, लक्षमण भी तुम और रावण भी तुम
तुम ही  संरक्षक  और  भक्षक भी तुम

फिर सीता का दोष ही क्यों दिखता है?

जो बच गयी हर परीक्षा से वो सीता थी…
आम नारी नही…
वो भी…
दूजी  परीक्षा मे, धरती मे समा गयी…

 आज जब तुम,  राम ना  बन सकते हो
फिर सीता की परीक्षा क्यों लेते हो?