श्वेत मखमली चादर मे…

फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे,
एक ही रंग दिखता है,
श्वेत-श्याम एक-दूजे संग,
देखो कितना जचता है…

एक रंग मुझे, बंद आँखों से भी,
स्पष्ट दिखता जाता है,
सारे रंगों को जो,
फीका करता जाता है,

जब सुर्ख लाल रंग,
तुम्हारे प्यार का,
श्वेत मखमली चादर मे,
फैला-बिखरा सजता है…

श्वेत-श्याम एक ही, होकर…
सुर्ख लाल मे, छिपता है…
फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे…
एक ही सिंदूरी रंग दिखता है…

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एक बचपन उसने जिया (बाल दिवस विशेष)

एक कमरा सपनो  भरा,
फर्श मखमली, छत सितारों भरीं,
दीवारें रंगों सजीं, खिड़कियाँ फूलों रंगीं,

सपने कहीं उँचे की, आकाश भी कम लगे,
ज़मीन कहीं मखमली की, बाल भी शूल लगे,
एक बचपन उसने जिया, जिसे सब कुछ कम लगा,

एक कमरा, कुछ टूटी-मूटी, सीकचों से बना,
फर्श चुभता, बहती-रिसती छत,
दीवारें उधड़ी, रंग बही, खिड़कियाँ शूलों सजीं,

सपने बस इतने की, आकाश तले छाँव मिले,
ज़मीन बस इतनी रहे, की पैरों तले से  न हटे,
निधि “एक बचपन उसने  भी जिया, जिसे कभी कुछ भी ना मिला….

 

मैं अपने मन की राह चुनूंगीं

मैने कयी बार,
कभी अपनों के,
कभी तुम्हारे कहने पर,

नयी सुबह का इंतज़ार किया,
नयी माला मे फूल गुथे,
नयी रंगों की रंगोली भरी,
नयी खुशबू से घर महकाया,

नयी सुबह जब भी आई,
पूरानी काली रातों की,
छीनी ही सही, चादर ओढ़ के आई,

नयी माला के फूल,
कुछ पल मुस्कुराकर,
मुरझा जाते है, शाम तलक़,

नयी रंगों की रंगोली,
रंगों को बेरंग कर,
बिखरती है, कुछ ही पल मे,

नयी खुशबू घर को मेरे,
महकाकर, सारे कोने,
हवा हो जाती है, पल भर मे,

अब ना अपनो की, ना तुम्हारी सुनूँगी,
मैं अपने मन की राह चुनूंगीं,

जब भी सुबह आएगी,
नयी माला तुझको अर्पण करूँगी,
एक ही रंग की, रंगोली बनाकर,
सच्ची खुशबू- सच्चे रंगो से,
अपने घर-जीवन को भरूँगी,

वो सुबह ही, मेरी होगी,
वो माला की, भीनी खुशबू,
वो रंगोली का, एक ही रंग,
मेरे घर और जीवन को सजाएगा…

हाँ, “निधि”मन की राह चुनूंगीं,
ना अपनो की, ना तुम्हारी सुनूँगी 

हर शब्द कहने के पहले , बहुत बार सोचा…

हर शब्द कहने के पहले , बहुत बार सोचा…
हर कदम उठाने के पहले , बहुत बार रोका…

हर धड़कन सुनाने के पहले , बहुत बार सोचा…
हर सपना सजाने के पहले , बहुत बार तोड़ा…

हर रंग भरने के पहले , बहुत बार बेरंग किया…
हर सांस लेने के पहले , बहुत बार दम को रोका…

हर पल जीने के लिए , बहुत पल को खोया…
हर हँसी दिखानेके पहले , बहुत बार रोया…

हर मदहोशी दिखाने के पहले , बहुत बार होश खोया…
हर चैन पाने के पहले , बहुत बार बैचेनी को पाया…
 
हर अरमान जगाने के पहले , बहुत बार अरमान छोड़े…
हर तरफ तुमको पाने के पहले , बहुत बार खुद को खोया…

हर शब्द कहने के पहले , बहुत बार सोचा…
हर कदम उठाने के पहले , बहुत बार रोका…