हो सके तो, लेती आना….

मैं यहाँ बहुत दूर हूँ घर से,
सात समंदर पार हूँ जब से,
ना सौंधी मिट्टी की खुशबू पाती हूँ,
ना नीले आसमान का आँचल पाती हूँ,

पापा का आँगन, दूर है जब से,
माँ आँचल, सिर पर ना जब से,
अपने आँगन मे, रेखा ना कोई पाती हूँ,
माँ के प्यार को बस, अपने मन मे ही, निधि पाती हूँ,

ना माँ के हाथ का खाना है,
ना पापा की, प्यार भरी नसीहत है,
सब कुछ, खाली-खाली और कम सा है,

तुम आते-आते, हो सके तो, लेती आना….
इनमे से, किसी, एक का भी, आधा सा ही, अपना-पन लेती आना…

 

श्वेत मखमली चादर मे…

फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे,
एक ही रंग दिखता है,
श्वेत-श्याम एक-दूजे संग,
देखो कितना जचता है…

एक रंग मुझे, बंद आँखों से भी,
स्पष्ट दिखता जाता है,
सारे रंगों को जो,
फीका करता जाता है,

जब सुर्ख लाल रंग,
तुम्हारे प्यार का,
श्वेत मखमली चादर मे,
फैला-बिखरा सजता है…

श्वेत-श्याम एक ही, होकर…
सुर्ख लाल मे, छिपता है…
फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे…
एक ही सिंदूरी रंग दिखता है…

– कहा करते थे –

1)
“वो”, मुझसे, बेइंतहाँ प्यार करता था,
ऐसा वो और लोग मुझसे कहा करते थे,
मेरे कारण उसके लबों मे हँसी,
और आँखों मे पानी आया करता था,
ये हम भी देखा करते थे…
उसे प्यार से हम, “पागल” कहा करते थे…
2)
हमने कुछ महसूस किया/कुछ नहीं किया,
उसको नाकार कर, बहुत सारी बातें समझाकर,
ये भी मानकर की, हमने उन्हे समझा दिया है,
“बेवफ़ाई” का बोझ भी अपने दिल से हटाकर,
और ये मानकर/मनाकर की,
समय के साथ, “वो पागल”… भी समझ जाएगा,
अपना दिल हल्का कर हम आगे चल दिए…
3)
“उससे”, मैं, बेइंतहाँ प्यार करती हूँ,
ऐसा मैं और मेरे जानने वाले, मुझसे कहा करते है,
उसके कारण मेरे लबों पे हँसी,
और आँखों मे पानी आता-जाता रहता है,
ये वो भी देखा करते है…
प्यार से मुझे, “पगली” कहते है…

वो बेचैनी, वो तड़प, वो दर्द, वो ग़म…
वो आँसू, वो जलन, वो चुभन, वो तपन…

हम भी महसूस करते है, न जीते है/न मरते है…
उस बिन मेरी साँसे,रुक जाएँगी,ये जाना/माना करते है…
4)
उसने कुछ महसूस किया/कुछ नहीं किया,
हमको नाकार कर, बहुत सारी बातें समझाकर,
ये भी मानकर की, उसने हमे समझा दिया है,
“बेवफ़ाई” का बोझ भी अपने दिल से हटाकर,
और ये मानकर/मनाकर की,
समय के साथ, “ये पगली”… भी समझ जाएगी,
अपना दिल हल्का कर वो आगे चल दिए…
5)
“वो” जो मुझसे बेइंतहाँ प्यार करता था,
उसका दर्द, मेरे दिल मे समझ आता है अब…
जब…
“उसने” जिसे मैं प्यार करती हूँ,
मेरे प्यार को नाकारा है अब…

एक ही आवज़ आती है हमेशा…

एक बार मिलूं उससे,
जिसे मैने ठुकराया था…

एक बार उसे भी ठोकर लगे,
जिसे मैने अपनाया है…

जो मुझको महसूस हुआ?
क्या???
वो, उनको भी महसूस होगा?

एक दूजे की…
बेचैनी, तड़प, दर्द, ग़म…
आँसू, जलन, चुभन, तपन…
को समझेंगें?

एक-दूजे से मिलकर, मुस्कुराकर, जीवन की राह मे, आगे चल देंगे?

 

 

 

जो प्यार करते हो तुम भी उनको,तो ये जान लो…

तुम कहते हो,वो बेवफा हो गया है…
प्यार मे दर्द, हर रोज़ दे गया है…
कभी सज़ा देता है, तो कभी रुला देता है…

जो जानते हो ये की, वो तुमसे प्यार किया करते थे…
तो अब ये मान लो…

उसने कही ज़्यादा उन्हे ही ,”प्यार” करने का अब वक़्त आ गया है…
दर्द ए दिल जो मिला है तुम्हे, दर्द ए दावा तुम बन जाओ…

क्यों भूलते हो उन पलों को, जिसमे वो तुम्हे…
दावा भी बनते थे, कभी दुआ भी देते थे…

माना की…
वो न लाएँगे अपनी ज़ूबा पर कभी तुम्हारा नाम…
वो न करेंगे दुनिया के सामने अपने प्यार का इकरार…

तुम उनकी इस जीझक को बेवफ़ाई न मानलो …
जो प्यार  करते हो तुम भी उनको,तो ये जान लो…

वो दागा करे या वफ़ा करे प्यार मे…
तुम वफ़ा ही करो अपने प्यार से…

प्यार जब किया था तुमने…
क्या तब ये जाना  था तुमने…

वो तुम्हे प्यार ही करेगा…
जो प्यार करने के पहले तुमने ये ना जाना था…
तो अब क्यों अपना प्यार कम करते हो…
 
वो ना करे, जो टूटकर तुमसे प्यार…
तुम लुट कर भी उन्हे प्यार कर लो…

जितना प्यार मिला है तुम्हे…
उसका शुक्रिया करो…
जो न मिल सका उसे पाने की दुआ करो…

प्यार मे जो केवल पाना न चाहे…
देना भी सीखे…
तो उसक प्यार कभी वेवफा ना होगा…
तुम ये जान लो…

प्यार मे बदला नही लिया जाता है …
खुद को बदल दिया जाता है…
जो तुम ये मान लो, तो…
दिल का हर दर्द दवा बन जाएगा…
 

वो शब्दों की बात करता है…

वो कहता है, तुम अपना प्यार शब्दों में बयां करती हो कैसे ?

वो शब्दों की बात करता है …

जो दिल में धड़कता है , सांसों में बसता है ,
जी रही हूँ , बस उसका नाम लेकर ,
मरना भी है , बस उसका नाम लेकर ,

जो आँचल मे समा जाए , वो प्यार तो कम है ,
जो शब्दों मे आ जाए वो , वो प्यार भी कम है ,

 वो शब्दों की  बात करता है…
जो दिल में धड़कता है , सांसों में बसता है ,

Published in: on मार्च 25, 2009 at 9:08 अपराह्न  टिप्पणी बन्द वो शब्दों की बात करता है… में  
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