टूटे-छूटे बिखरे-सिमटे पल

फिर खोज रही हूँ,
वो टूटे-छूटे, बिखरे-सिमटे पल,

जिनको हमने जाने मे,
कभी अनजाने मे,
छुपा दिया था,
कभी आँसू मे,
कभी मुस्कान मे,

वो हर एक पल,
कुछ कह रहा है,
कभी ज़ोर से,
कभी चुपके से,

कुछ आवाज़े जो हल्की है,
उनको फिर से, ज़ोर से सुनना है,
जो, ज़ोरों से कनों से टकराती है,
उनको हल्का करना है,

तुम साथ हो निधि के ,
इसलिए..
बिखरे पलों को समेटना है…
मेरी उलझनों को,
तुम्हारे हाथो से, सुलझना है…
क्योंकि…
उन टूटे-छूटे, बिखरे-सिमटे पलों को,
प्यार मे बदलना है…  

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तुम

तुम बहुत मीठा बोलते हो,
हर शब्द को, चाशनी मे घोलते हो,
मिशरी की तरह, रस घोलते हो,

न कड़वा बोलते हो,
न शब्दों के तीर चलाते हो,
बिन कुछ बुरा कहे ही,

मीठे शब्दों मे ही,
कड़वा सच सुनाते हो,

अब

1) पहले :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
तुम मेरे दिल तक आए,
कुछ यूँ समाए की,
दूजी, सारी दस्तकें, सारी आहटें,
मुझसे कोसों परें हो गयीं…

2) कुछ दिन पहले तक :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
मुझसे दूर हुए, दूर भी इतने की,
दूजी, हर दस्तक, हर आहट,
मेरे कानों मे गूंजा करती,
तुम्हारी दस्तक, तुम्हारी आहट नही,
ये कहा करती थी….

3) अब:-
ना दस्तक, ना आहट है,
ना दरवाज़े पर नज़रे टिकी है,
ना किसी आवाज़ की पुकार है,

~ मैं नदी थी ~

मैं नदी थी
प्यासी सी
तुम सागर से
मिलने चली थी

मिलकर सागर मे ये जाना

मैं ही अकेली, प्यासी नही थी
सागर तुम भी तो, कुछ प्यासे थे

विशाल हृदय के तुम स्वामी
कुछ तो तुम भी खाली थे

मिलती हो मुझ जैसी
सौ नदियाँ तुमसे, पर
मेरी भी प्रतीक्षा, करते थे

शांत-गंभीर और परिपक्व
तुम सदा ही दिखाते थे

कितने चंचल-कोमल
तन-मन के हो स्वामी

मिलकर तुम सागर मे, ये जाना

अथाह जल तुम्हारे अंदर
अपर सीमा के तुम स्वामी

तुम भी थे, कुछ प्यासे-प्यासे
राह मेरी भी, ताकते थे

मीठे-सादे और निर्मल जल की
चाह तुम्हे भी रहती थी

मिलकर तुम सागर मे ये जाना

तुममे मिलती हों
कयी नदियाँ मुझ जैसी
पर प्यास तुम्हारी भी
बुझती नही थी

तुम संग मिलकर
अपने रूप को खोती
तुम्हारा खारापन भी अपनाती

अपनी प्यास बुझाने
तुम्हे मीठी कर जाने

तृप्ति देने और पाने ख़ातिर
हर बार तुमसे ही, मिलने आती हूँ

तुम्हारा खारा ही स्वाद सही
पर तुममे ही तृष्णा पति हूँ

 

सुख मे ना सही , दुख मे मुझे हमेशा अपने पास पाओगे…

तपती धूप मे , दुख के तूफ़ानों मे
ग़म की परछाईयों मे , अंधेरी रातों मे
भटकी हुई राहों मे , अनजानी मन्ज़िल मे
तन्हाई की शामों मे , अकेली रातों मे
 
सुख मे ना सही , दुख मे मुझे हमेशा अपने पास पाओगे…

मैं अधूरी हूँ, पूरी कर जाओ

मेरी आँखों के आँसू आज थमते नही है
ये सिसकियाँ मेरी रुकती नही है
ना जाने क्या बात हुई आज की
हम जीते नही मरने लगे है

भोर होते ही यूँ लग रहा था
आज कुछ कमी सी है
दर्द था जो दिल मे कहीं छुपा हुआ
आज उभर कर आ ही गया

ना जाने आज ये क्यों हुआ
पर आज कुछ गॅमी सी है
भूल गयी थी जिन बातों को
समय संग आगे चल पड़ी  थी

वो समय आज फिर रुक गया
मैने  जो तिथि आज देख ली

हृदय वेदना से भर गया
जो दर्द तन मे हो रहा था
वो मन के घावों की याद दे गया

भूल गयी थी आज  की तिथि
जो मुझे “माँ” नाम दे सकती थी

गुज़र गये यूँ महीने नौ
जो तुम होते तो,
मेरे आँचल मे भी एक तस्वीर उभर सकती थी

जो ना याद रखे कोई तुम्हे
मेरा दिल तुम्हे याद करता है

मुझे जो छोड़ गये हो अधूरा
एक बार फिर से आ जाओ

तुमसे वादा करती हूँ
तुम्हारा पूरा ध्यान रखूँगी
इस बार कोई ना ग़लती करूँगी

मिट भी जाऊ, तो भी तुम्हे लाकर रहूंगी

वो दर्द जो मैं न सहा, वो ख़ुशी जो मुझे न मिली

आकर वो मुझे दे जाओ

मेरी सुनी गोद पड़ी है
राह तुम्हारी देख रही है
मेरी वेदना को सुन जाओ
मैं अधूरी  हूँ ,पूरी कर जाओ

एक बार तुम आ जाओ…
 

वो शब्दों की बात करता है…

वो कहता है, तुम अपना प्यार शब्दों में बयां करती हो कैसे ?

वो शब्दों की बात करता है …

जो दिल में धड़कता है , सांसों में बसता है ,
जी रही हूँ , बस उसका नाम लेकर ,
मरना भी है , बस उसका नाम लेकर ,

जो आँचल मे समा जाए , वो प्यार तो कम है ,
जो शब्दों मे आ जाए वो , वो प्यार भी कम है ,

 वो शब्दों की  बात करता है…
जो दिल में धड़कता है , सांसों में बसता है ,