हो सके तो, लेती आना….

मैं यहाँ बहुत दूर हूँ घर से,
सात समंदर पार हूँ जब से,
ना सौंधी मिट्टी की खुशबू पाती हूँ,
ना नीले आसमान का आँचल पाती हूँ,

पापा का आँगन, दूर है जब से,
माँ आँचल, सिर पर ना जब से,
अपने आँगन मे, रेखा ना कोई पाती हूँ,
माँ के प्यार को बस, अपने मन मे ही, निधि पाती हूँ,

ना माँ के हाथ का खाना है,
ना पापा की, प्यार भरी नसीहत है,
सब कुछ, खाली-खाली और कम सा है,

तुम आते-आते, हो सके तो, लेती आना….
इनमे से, किसी, एक का भी, आधा सा ही, अपना-पन लेती आना…

 

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कुछ पंक्तियाँ

चलते थे जिस ज़मीं पर, संभल संभल कर हम,
सरकी वही ज़मी  नये कदम उठाने के पहले,

आसमान से तो पानी बरसता था अक्सर,
आग ही बरसी जब हम निकले  बिन तैइय्यारी के,

रौशनी रहती थी हर रोज़ ही दिन मे,
ग्रहण ही लगा सूरज को जब  हम दिन मे निकले,

छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

छोटे छोटे सपने थे,
पास मेरे सब अपने थे,
न थी चाह, आसमान मे उड़ाने की,
धरती ही मेरी अपनी थी,

बड़ा सोचो, बड़े सपने देखो,
जो चाह न मेरे अपनी थी,

जीना था, तो अपनो से लड़ना था,
जीतना था, तो अपना सब हराना था,
ये राह न मेरी अपनी थी,

सपने देखे, जिए और पूरे किए,
लड़ाई लड़ी और जीती भी,
राह मे आगे और आगे बढ़ गये,

थोड़ा ठहरकर जो सांस ली,
बड़े सपने, जो न दिल के थे,
सब पूरे हो गये,
छोटे सपने, जो दिल के अपने थे,
सब अधूरे रह गये,

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?
मेरे सब अपने कब दूर हो गये?
आसमान का तो कोई छोर नही,
पैरों के नीचे की धरती, भी खिसक गयी…

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?