रिश्ते की सीमा

कुछ बातें, कहकर, नही, कहीं जातीं,
कुछ बातें सुनकर, नही, समझी जातीं,

कहने और सुनने के,
समझने के, अंतर को,
अपनी बुद्धि से कम करना होगा,

बिन कही बातों को,
बिन सुनकर,
समझना होगा,

कुछ रेखाएँ, सीमाओं की,
बिन खीचें,
माननी होंगी,

मर्यादायों के बंधन को,
बिन बाँधे, 
बाँधना होगा,

हर रिश्ते की हद को,
बिना कहे,
हद मे रहना होगा

हर रिश्ते को उसका,
सही नाम,
मान देना होगा…

जो कह कर ना हो सके,
उसे समझकर,
करना होगा,

हर रिश्ते की सीमा मे,
हम सबको रहना होगा….

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पुनी पुनी चंदन पुनी पुनी पानी…

पुनी पुनी चंदन पुनी पुनी पानी….

अपनी सहेली के ग्रहप्रवेश के फोटो देखने के बाद.आज बचपन की एक कहानी याद आ गयी.

एक गुरुजी होते है, उनके शिष्य बहुत मूर्ख और आलसी होते है.
गुरु जी को एक समय, बहुत आवशयक काम से, दूसरे शहर जाना होता है.
अपने सबसे मूर्ख और आलसी चेले को, वो एक काम सौपकर जाते है.
ये सोचकर की इस काम को करने से, चेला कुछ सीखेगा और कम आलसी बनेगा.
सुबह ४ बजे से जागकर, शालिग्राम जी (काले वाले शंकर जी), को नहलाना है,
हर बार नहलाने के बाद चंदन लगाना है,
कुछ खास मन्त्र याद करके, उनकी पूजा करनी है, और भी बहुत कुछ.
चेला तो चेला… कुछ भी नही किया…
जिस दिन गुरु जी आने वाले थे, उस दिन भाग कर नदी गया,
ताकि भगवान को नया चंदन लगा सके, नदी मे शालिग्राम जी बह गये.
चेला तो चेला… बहुत सोचा क्या कर, क्या उत्तर दे, गुरु जी को?
रास्ते मे उसे एक जामुन का पेड़ मिला, उसमे से एक जामुन गिरा,
शिष्य को रास्ता मिल गया…
जब गुरु जी आए, उन्होने शालिग्राम जी को छूकर देखा, तो पूछा,
शालिग्राम जी ऐसे, पिलपिले( चिपचिपे) कैसे हो गये?
शिष्य बोला, आपने ही कई बार भगवान नहलाने और चन्दान लगाने कहा था,
पुनी पुनी चंदन, पुनी पुनी पानी, शंकर सड़ गये हम क्या जानी?????
(अब , बार बार ऐसा करने से शंकर जी “सड़” गये और पिलपिले हो गये… तो मैं कैसे जानूं?)
हा हा हा…
कहानी की शिक्षा बहुत सारी है… तुम खुद सोच सकते हो, अगर चेले सा दिमाग़ नही होगा तो…

सूरज की पहली किरण

भरी धूप मे, आज ऑफीस जाते समय ही उसने सोच लिया था, शाम को घर वापस जाते समय, आज मंदिर जाऊंगी…
मंदिर मे हाथ जोड़े खड़े, मन न जाने कितनी पूरनी बातों और यादों से भर गया… आँखों से फिर कुछ आँसू गिर गये, सिर पर रखा दुपट्टा संभालते हुए, साथ ही आँसू भी पोछ लिए… पीछे से एक आवाज़ आई, चलो घर, बहुत देर हो गयी, पिछले नौ सालों से तुम यहाँ आती हो और न जाने कहाँ-कहाँ जाती हो, तुम्हे क्या मिला?

घर पहूचकर ठंडा पानी पी ही रही ही थी की, फ़ोन की घंटी बज़ उठी… एक २ दिन का बच्चा, मरणासन्न अवस्था मे, हॉस्पिटल मे पड़ा है, आना है क्या उसे देखने? पानी आधा ही छोड़कर, अपनी बात आधी-अधूरी समझाती हुई, पति को साथ चलने कह  निकल पड़ी… कितने सालों से, अपने सभी  आत्मीय लोगों को समझा रही थी, कितना इलाज करवाया, आधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया… शारीरिक और मानसिक तकलीफ़ के अलावा कुछ भी न मिला… अती शिक्षित, अती आधुनिक सोच वाले परिवार का हिस्सा होते हुए भी, अपनी बात, अपनी सोच से किसी को भी बदल नही पा रही थी… यहाँ तक की, हर कदम पर साथ देने वाले अपने जीवन साथी को भी समझाने मे असफल थी… नौ सालों का लंबा, एकाकी सफ़र, सब कुछ होते हुए भी कोई कमी, उसे अंदर से खोखला कर चुकी थी…

हॉस्पिटल मे पहुचते ही, जैसे बच्चे को देखा, लगा की कल, सूरज की पहली किरण भी ना देख पाएगा, पर मन से कहीं आवाज़ आई, इस माह मिली तनख़्वा अगर खर्च भी कर दूं और शायद बच्चा बच जाए, तो एक माँ को उसका बच्चा मिल जाए… जो सुख मुझे ना मिल पाया, वो इस ग़रीब को मिल जाए…उस औरत के साथ  dr. से मिलने गयी… dr. ने खर्चा बताने के पहले ही ये बात दावे से कह दी, अड़तालीस घंटे निकलना असंभव है… रुपये लगाने के पहले सौ बार विचार कर लें, वो बेचारी  ग़रीब औरत ये सुनकर ही लापता होगा यी, माँ का दिल जो था..

न जाने क्यों उसकी इक्षा शक्ति या प्यार देखकर, पति ने साथ दिया… दोनो ३दिनों तक उसके सिराहने बैठे रहे… ३दिनों बाद सूरज की पहली किरण के साथ जब उस मासूम ने आँखें खोली तो, इन्हे सब मिल गया, कई दिनों की क़ानूनी कार्यवाही के बाद आज “सूरज” आपनी माँ के आँचल मे निकला…   

कृपया अपने जूते बाहर उतरे !

                                                          कृपया आपने जूते बाहर उतरे !


ये बात हम कब से समझते और समझाते आए है की,  “कृपयाअपने जूते बाहर उतारे “!
पर इतनी सीधी सी बात ना हम किसी को समझा पाए और ना ही कोई समझ पाया!
शायद समझ  का फेर हो गया?  चाहे स्वच्छता की बात हो या सुंदरता की या फिर
 घर की सजावट की, जूते केवल पैरों मे ही सुंदर  और शालीन लगते है!
कितने ही कीमती हो या सस्ते पैरों की शोभा पैरों मे ही भाती है, कही और नही!
 ना ही हम इन्हे हाथों मे पहन सकते है ना ही सिर का ताज बना सकते है!
 
पैरों  से  उतरे और बस महाभारत मचा देते है!  सुधरे को बिगाड़ना हो या बिगड़े को सुधारना हो
या होश ठिकाने लगाना हो, पैरों की ये शोभा अच्छे अच्छों की शोभा मे चार चाँद लगा देती है!
इनकी महिमा मंडित करने की आवश्यकता नही है, ये वो हथियार है जो बिना आवाज़ के चलता
है और इसका निशाना सही जगह लगे या ना लगे इसके वार की आवाज़ चारों तरफ गूँजती है और
घाव सालों तक हरा रहता है! हर दर्द का मलहम और ज्खम का इलाज कहा जाने वाला  समय तक,
इस घाव को नही भर सकता कभी सुना करते थे की यहाँ बातों के जूते चले, वहाँ बातों के जूते चले !
बातों बातों मे ही जूते मारने की बात से ही, सभी के होश उड़ जाते थे! अब तो वो समय आ गया है,
जब लोग भारी सभा मे भी जूता मारने का कोई भी मौका  नही छोड़ते है, इसे सबसे अच्छा ज़रिया मानते है
अपनी बात रखने का ! जितनी बड़ी महफ़िल उतना तगड़ा जूता ! जितना बड़ा आदमी जूता खाए, उतना
बड़ा नाम जूता मारने वाले का नाम और शोहरत भी ! शोहरत पाने की चाह मे अब ये एक आसान रास्ता
बन गया है !

 महफिलें लगाने वाले और ख़तरों से खेलने वाले  अब थोड़ा सतर्क हो जाएँ, वो लोग भी जिन्होने
जिंदगी भर  बातों के जूते चलाएँ है, वो दिन अब दूर नही,जब किसी दिन आपसे चिड़ा हुआ कोई
आम या खास आदमी आपकी तरफ के जुटा फेंक दे ! अपनी इज़्ज़त अगर बचा कर रखनी है,
तो पुरानी बातों पर ध्यान दे और खुद भी अपना जूता बाहर रखे और दूसरों से भी उनका
जूता बाहर रखने को कहें ! अब, लगता है सब ये बात आसानी से समझ  पाएँगे!

 

आज़ादी के मायने

सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा…स्वतंतरा दिवस की एकसठवीं सालगिरह पर,सवतंतरा देश के समस्त निवासियों को हार्दिक बधाई!हमे गर्व है की हम हिन्दुस्तानी है! इस गर्व के साथ ही बहुत सारे प्रश्न है!एक आज़ादी के बहुत सारे पहलूं है! हर किसी के लिए आज़ादी का मतलब अलग-अलग है!किसी के लिए यह केवल आज़ादी है!आज़ादीमज़ा करने की,अपने मान का करने की,घूमने की,बोलने की और ना जाने किस-किस की!  आज के समय मे स्वतंत्रता से जुड़े मेरे मान मे अनेक सवाल है!जो एक आम आदमी के मान के सवाल है,जिनके उत्तर खोजने को मेरा मान करता है! 
आज़ादी कैसी? कौन सी? किस की? किस के लिए? कितनी आज़ादी? आज़ादी कहाँ तक? कब तक? इस आज़ादी को बचाए रखने के लिए हमे अभी और भी लड़ईयाँ लड़नी है! 
वो लड़ईयाँ है गंदी राजनीति से, आतंक से,भ्रष्टाचार से, आर्थिक कमज़ोरी से,बेरोज़गारी से,ग़रीबी से,भुकमरी से,समाज़ मे फैली बुराईयों से,सबसे महत्वपूर्ण अपने आप से, 
अपनी सोच से,अपनी हरकतों सेक्योंकि आज हम आज़ादी का सदूपयोग नही वरण केवल भोग कर रहे है! भटके हुए हैआज़ादी का ग़लत इस्तेमाल कर रहे है!जिसे मिली है और जो उपयोग का सकते है,वो मान चाहा उपयोग कर रहे है,नेता,राजनेता,पुलिस,अधिकारी,उचे पद मे बैठे लोग,अब तो मीडिया भी जिसे जनता की आवाज़  माना जाता था!  सब आज़ादी का अपनी तरह से उपभोग कर रहे है!कैसे?तो कुछ प्रश्नों पर ज़रा गौर कीजिए – 

वादी को जलता देखने की आज़ादी – पिछले माह से धरती का स्वर्ग कहे जाने वाली वादी को जलता,देखने की आज़ादी!हमारी आज की स्वतंत्रता समारोह की खुशियों पर सबसे बड़ा  सवाल है, जिसके लिए आज़ादी,अमन,शांति की बात करते है,अपना कहाले है उसे ही सुलगा रहे है! 

मंहगाई की आज़ादी –

पिछले  नौ माह से माहगाई लगातार बढ़ रही है!पिछले लगातार दो हफ्तों से वा अपने चरम पर याने १२% के ऊपर चल रही है!यह मंहगाई की आज़ादी है!  आम जनता का क्या? वो भूक की और लाचारी की आज़ादी मनाएँगे! 

वेतन बड़ाने की आज़ादी – चुनावों के मद्देनज़र केंद्रीय कर्मचारियों का वेतन बड़ाने की आज़ादीआम आदमी और देश को अन्ना देने वाला किसान भले ही भूकों मारे,उसकी चिंता 
कहाँ किसी को!वोट बॅंक  के लिए ग़रीब,मज़बूर किसान कहाँ कम आएगा? 

सैनिकों को कोई रियायत ना देने की आज़ादी – छठे वेतन मान मे उच्च अधिकारियों का वेतन तो बड़ा दिया गया है,पर सीने मे गोली खाने वेल सैनिक को जो वेतन मान दिया  गया है, वह चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के बराबर है!हमारे और देश के लिए जान पर खेलने वेल की कीमत इतनी ही है? 

राष्ट्रीय सम्मान ना देने की आज़ादी – जब मानेक शौ की तरह के महान इंसान को राष्ट्रीय सम्मान देने का फ़ैसला उनके संस्कार के बाद किया गया तब एक अड़ना सा सैनिक 
अपने लिए क्या अपेक्षा रख सकता है?देश के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या होगी? 

आयुषी को आज़ादी – 

आयुषी के  नन्हे से जीवन को तार-तार होता देखने की आज़ादी!ये है मीडिया की आज़ादी जो काबी किसी को अपने सामने जला देती है,तो कभी किसी 
को चैन से बँधा देखकर फोटो लेने की आज़ादी का जशन मानती है! 

डाक्टर्स को आज़ादी – 

कही किसी डाक्टर को आज़ादी है की वो किसी की भी किडनी, खून निकाल ले!तो कही ८०% गावों मे  डाकटर्स को कम ना करने की आज़ादी है,तो 
कही ९०% गावों मे दवाईयाँ ना बताने की आज़ादी है! 

नोट उड़ाने की आज़ादी – 

संसद जैसे गरिमामय स्थान मे,आम ग़रीब जनता के खून पसीने की कमाई को सरेआम उडकी आज़ादी!क्या इतने रुपयों से देश के ग़रीब को भोजन
मिल पता!हमारे देश की जनता जहाँ दिन की न्यूनतम मज़दूरी नही कमा पाती,वाहा यू रुपये उड़ाने की आज़ादी?

धमाके करने की आज़ादी – 

अपनी आज़ादी को बरकरार रखने के लिए,हम जगह -जगह धमाकों को होने की आज़ादी देते है!फिर उन्ही नेताऊ को,उसी पद मे पुनः बैठते है, ताकि वो बार – बार इस तरह से आज़ादी का मज़ाक उड़ाए और मनमानी करे.!

जनता को न्याय की आज़ादी –

आज़ फिर से सदियों पूरना,न्याय करने का तरीका वापस  गया है,जहाँ लोग आँख के बदले आँख,खून के बदले खून लेने को तैयार है और पुलिसप्रशशणहाथ बाँध कर देखता है!ये न्याय की आज़ादी है!वर्दी वालों को आराम करने की आज़ादी!

प्रतिमा लगाने की आज़ादी 

दिवस के शुभ अवसर पर संसद मे भगत सींग प्रतिमा लगाने की सुधा बसठवे साल मे आई,वो भी शायद इसलिए की उन पर फ़िल्मे बन गयी है!
पर उनके साथ उनके जीतने ही महान,देश के लिए शहीद हुए,सुखदेव और राजगुरु को याद नही किया गयावही दूसरी ओर दंगों और धमाको के प्रदेश मे,स्वतन्त्र का जश्न मनाने,अमर शहीदों के नही वरण,मुख्य मंत्री जी के काटऔटलगाए गये!शहीदों से इन्हे क्या मतलब?देश तो इन्होने ही आज़ाद करवाया है,और आज जो शांति का माहौल है,प्रदेश मे,उसकेज़िम्मेदार भी तो यही है!इसलिए इनके पोस्टर ही लगाने चाहिए आज़ादी के दिनदूसरी ओर अपने जीते जी,अपने को महान और ईश्वर तुलया बटाने वाली मुख्यमंत्री ने जगहजगहआपनी मूर्तियाँ लगवान दी और इस हेतु उस आदमी के नाम की दलील दी जा रही है जो अब इस दुनिया मे ही नही है!तो क्या इन्हे ये भी भरोसा नही है की जनता इन्हे,इनके कामोसे याद रखेगी?शायद नही इसलिए तो अपनी प्रतिमा लगवा रहीं है! दूसरी ओर हमारे देश मे चापलूसों की इतनी बड़ी लाईन है की,वो नेताओ को देवीदेवताओ का रूप बनाकर,धामिकता का मज़ाक उड़ा रहे है!ये हमारे नेताओ और चापलूसों की आज़ादी है!

आधुनिकता की आँधी दौड़ मे शामिल होने की आज़ादी-

ये दौड़ हम पर ऐसी सवर है की आज हर आदमी आखन बंद किए अंधानुकरण कर रहा है!जिन चीज़ों से कोई लेना -देना नही,जिनकी समझ नही उन्हे केवल अपनी पहचान बनाने के लिए कुच्छ भी कर रहा है!

चारों और आज़ादी ही आज़ादी 

 कम कपड़े हो,दोस्ती के नाम पर चिपकाना हो,किसी की भी निज़ी जिंदगी को,किसी भी हद तक सार्वजनिक करना हो,मित्रों के साथ ग़लत 
तस्वीरे लेना हो,अधिक जानकारी के चलते,ग़लत बातों को सफाई देते हुए,आसानी से करना हो,टी.वी मे चने या नाम कमाने के लिए कुछ भी करना हो!कुछ भी करने के लिए हम आज़ाद है!

कुछ मज़ेदार आज़डियान भी है जो मुझे यूँ लगती है –

कुछ भी सीरियल्स बनाने की आज़ादी- 

हम किस तरह के सीरियल्स आजकल देख रहे है,चाहे कॉमेडी के नाम हो, जिनमे दे अर्थों की गंदी कॉमेडी की जाती है!सास-बहू ये सीरियल्स हो,इन्हे देख -देख कर घर मे बैठी औरतें अपने को,खुद से जुड़ा समझकर,कहीं ना कहीं इन्ही की नकल करके,अपने रिश्तों को शक की आग मे झोक कर बर्बाद कर रहीहै!ये उनकी आज़ादी है,झूती दुनिया को सच मानने की! माता-पिता की चाहत मे छोटे छोटे बच्चों को कड़ी मेहनत करा कर, मंच मे बड़ों की तरह हरकतें करने की और कॉमेंट्स सुनने की आज़ादी!
जिससे आम-ग़रीब बच्चे इसी चाहत मे पदाई-लिखाई छोड़कर नाच-गाना शुरू कर देते है दिन-रात उन्ही ४,५ सितारों की,ज़िंदगी की कहानियाँ सुनते रहना, जैसे देश मे बस यही परिवार है,इन्ही से सारे संस्कार है,इन्ही को लोग आदर्श मान लेते है! वे ये भूल जाते है की ये सितारे,ये सब केवल अपनी कमाई के लिए ही कर रहे है!क्या इनकी हरकतों से आपको कोई फ़ायदा हो रहा है?
क्या ये अपनी कमाई आपको दे रहे है?क्या उनकी करतूतों से आपका भला हो रहा है?नही ना फिर भी इनको अपना आदर्श मानना आपकी आज़ादी है! अगर ह्म चाहे तो,अगर सब कोशिश करे तो इस ”शायद“को हम ”ज़रूर” मे बदल सकते है! आवश्यकता है तो मिलकर कम करने की और सोच को परिष्करत करने की!
 

            तो आज़ादी ऐसी है आज!हम इन बासठ सालों मे कहाँ से कहाँ आ गये है?जब तक हम इन बातों पर गौर नही करेंगे  और आने वाली नयी पीडी को नही समझाएँगे, हम आज़ादी का इसी तरह उपभोग करते रहेंगे!सोचने वाली बात है,
चीन जैसा देश जो अपनी आबादी के बावजूद,अपनी सन्स्क्रति को बचाते हुए,द्रन आर्थिक इस्थिति मे मज़बूती के साथ खड़ा है 
और पूरी दुनिया से ये मनवा ही लिया की वो कितना आगे है! क्या हम भी अपनी सन्स्क्रति को धरोहर के रूप मे,आने वाली पीडियों को देकर,आर्थिक और वैचारिक रूप से मज़बूत नही हो सकते?क्या आज़ादी को हम यू ही ख़तरे मे दल देंगे?क्या आज़ड़ी के बदते सालों मे हमारे भारत का गौरावमय इतिहास मिटाता  जाएगा शायद नही,

          “जब हम बदलेंगे तो हिन्दुस्तान बदलेगा,हम चाहेंगे तो नया सूरज चमकेगा“

फिसड्डी शिक्षक

 पुणे महाराष्ट्र मे सेट के नतीज़े घोषित हो चुके है, जो हमे सोचने पेर मज़बूर करते है, २१०० विद्यार्थियों मे से केवल४५ पास! ये नतीज़े हमे अचंभे  मे डालने वाले है! क्योकि इस परीक्षा मे बैठने वाले विद्यार्थी पी.जीकिए हुए और उच्च शिक्षित लोग है! फिर नतीज़े ऐसे क्यो? सोचने वाली बात है  की इनके लिए ज़िम्मेदार कौन?ये हाल आज का नही है पिछले वर्षो से इसी प्रकार के नतीज़े प्राप्त हो रहे है! मेरे विचार से इनके लिए जीतने  ज़िम्मेदार शिक्षक है, उतना ही ज़िम्मेदार शिक्षा प्राद्दाली भी है! आज शिक्षा के व्यवसाय मे, व्यक्ति अपनी इच्छा से नही बल्कि मज़बूरी से आता है!शिक्षा प्रदान करना उसकी सोच नही है! जो बाकी नौकरियों मे नही जा पाते,वो शिक्षक बनाने  जाते है! तो परीक्षा भी बेमन से देते है!

इसके पीछे काई कारण है! आज केवल शिक्षक ही ऐसा पद हैजिसमे केवल नाम की महत्ता रह गयी है काम की नहीशिक्षक के नाम पर संविदा  शिक्षकतो कही गुरुजी के नाम पर शिक्षको की भरती की जाती है वो भी मामूली तनख़्वाह पर और ये तनख़्वाह उसे महीनो  तक नही मिलती! अपनी दुर्दशा पर रोते शिक्षक कहाँ से दूसरों को शिक्षा देंगे!  उन्हे धरने पर बैठना पड़ता है, तो कही लाठी और ख़ूसें खाने पड़ते है! कोई भी मदद नही  मिलती!अब तो शिक्षक पद का सम्मान भी कम हो चुका है!किसी समय मे पूजे जाने वाले शिक्षक आज एक नमस्ते को तरसते है!

जहाँ प्रोफेशनल डिग्री पाने के लिए थोक के भाव कालेज खुल गये है,जिनमे कितने भी कम अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी बड़े रुपयो की नौकरी  पाने  के साथ ही साथ विदेश यात्रा भी कर लेता है!वहाँ मेहनत से पारम्परिक विषयो को पड़ने वालों को कोई नौकरी नही!अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति किस मानसिकता से परीक्षा देगा?परीक्षा देना भी ऐसे लोगों को भारी पड़ता है

इस गिरावट का कारण केवल यह नही है!आज आदमी के दिल मे रुपये कमाने के नयेनये और सस्ते रास्ते आते है!आज शिक्षक  बनाना पार्ट  टाइम काम माना जाने लगा हैलोग इसे साइड मे रखकर दूसरे काम करना चाहते हैइसलिए वो उस मेहनत के  साथ परीक्षा की तैयारी भी नही  करते है! नतीज़ा हमारे सामने है!पर ये सोचने वाली बात है कीअगर यही हाल रहा तो,  हम शिक्षक कहाँ से लाएँगे?हमे शिक्षकों की स्थिति सुधारने  के प्रयास पहले करने चाहिए!तब समाज़ मे और लोगों के बीच इस पद की महत्ता और सेवा भावना जाग्रत होगी और स्वेक्षा से लोग शिक्षक बनाने  को तैयार होंगे|

सोना और शुतुरमुर्ग बनना…

सोना और शुतुरमुर्ग बनना… ये  क्या बात हुई भला?आप भी यही सोच रहे होंगे की आख़िर ये दोनो मे क्या बात है?बात तो बहुत पाते  की है जी, बस नज़ारिए का फेर है!वो ऐसे की, जब हम स्कूल मे पड़ने जाते तो हमारी एक शिक्षिका हुआ करती थी, जो हम बच्चो से  मुहावरों मे बाते करती थी! जैसेतुमलोग बिना मार खाए सुधरोगे नही को वो कहती, “मार खाए धमधम,विद्या आए छमछमजब  बच्चे शोर मचाते और उन्हे आता देखा कर चुप हो जाते,तब वो कहतीशुतुरमुर्ग क्यों बने हो“, जब मुझे क्लास के बाहर हल्ला सुनाई दे रहा है, तो अब मूह छुपाने से क्या? अब शुतुरमुर्ग की तरह क्यों बन गये  हो! तब हम बच्चो को वो समझती भी की, शुतुरमुर्ग बहुत  डरपोक किस्म का प्राणी होता है,जब वो कोई परेशानी देखता है, याने जब कोई प्राडी उसको खाने आता है तोवो अपना मूह छुपा लेता हैभले ही पूरा शरीर दिखता रहे,वो सोचता है की उसे तो कुछ नही दिखा रहा, तो उसके शत्रु को भी वो नही दिखा रहा होगा, जबकि उसका  पूरा बड़ा शरीर दूर से ही दिखता है!जब हम ग्रहकार्या नही करते तो वो कहती,”आराम बड़ी चीज़ है मूह ढक के सोईए,किसकिस को याद  कीजे किसकिस पे रोईएयाने तुमलोग तो बाड़िया चादर तान के सो रहेहोगे, सोचा होगा सो जाओजब ग्रहकार्या करना ही नही है तो, कौन जागकर समय बेकार करे, कौन जागकर उसकी याद करे,चिंता करे,मस्त सो जाओ!कल की कल देखेंगे!

बचपन की ये बाते आब याद आती है, जब माबाप की बात ना सुननी हो, जब बीबी की किलकिल नही सुननी हो, बचे का होमवर्क ना  करवाना हो, बिज़ली का बिल नही जमा करना हो, बॅंक ना जाना हो या जब भी कोई कम नही करना होया तो चादर तान कर सो जाओ, देखते है कों कब तक चिल्लाता रहेगा? एकदो घंटे मे तो थककर चुप होजएगा! कौन कब तक अपनी रह देखेगा किसी कम के लिए जिसकी अटकी होगी वो अपना कम खुद कर लेगा! याने जब लगे की स्थिति विकट हो रही है तोशुतुरमुर्ग बन कर अपना मूह छुपा लो, जिसको शरीर दिखता है दिखता रहे?अपना क्या जाता है? अपने पास तो सीधा सा उत्तर है, अरे मैं भूल गया या सो गया भाई! बस जिसे  सिर पीटना है पीटता रहे! अपना तो आराम भी हो गया और काम भी दूसरे आदमी ने कर दिया और क्या चाहिए? जीवन मे सुकून और  आराम!जिसका खून जलता है.जाता रहे! हमारी तो तन्द्रुस्ति बरकरार ही रही!  तो सोने का रिकार्ड बनाने की भी प्राक्टिज़ भी बहुत हो  गयी है!समारे आराम मे कोई कितना भी खलल डाले हम जगाने वालों मे से नही है! माबाप चिल्लाए,बीबी खीजे, बच्चे रोए हमे क्या? ज़्यादा से ज़्यादा उठ कर यही कहना है अरे, मैं तो ये कम करने  वाला था, आपने कर दिया?कोई बात नही अगली बार कर दूँगा! कौन  है ऐसा, जो हमे पिछले  कुछ ही दीनो से जनता हो और हमे कोई कम बता दे? जिसने बताया उसका कम ऐसे किया की, वो दूबारा नही    मिला! अच्छेअच्छों के काम हमने ऐसे बनाए है की बस! सोन का एक और बहुत बड़ा फ़ायदा होता है, ना किसी का कम करना होता है, ना वो हमसे गड़बड़ होता है! ना किसी को सलाह देनी होती है, ना वो सलाह गड़बड़ होती है! दोनो ही स्थिति मे अपना ही फ़ायदा, लोग  कहते है सीधा आदमी है, किसी के मामले मे टाँग नही डालता!

माबाप,बीबी –बच्चों का क्या? इन्हे तो ऐसे ही जिंदगी गुजारनी है! वैसे यही लोग है जो मेरी नीद पर नज़र लगाए है!जब मैं अंगड़ाई  लेकर उठता हूँ, तो मेरी बीवी की बर नज़र मुझ पर यू पड़ती है मानो, मैं पिछले कई सालों से सो ही रहा हूँ!वो दो नज़रें मुझे यूँ देखती है  मानो मैने कोई बड़ा पाप किया है!इससे बचाने के लिए मैं दोबारा आँखे बंद करके सो जाता हूँ! एक बार फिर से सोने की कला भगवान   ने कुछ ही लोगों को दी है!मैं वो खुशकिस्मत हूँ!जो लगातार कईघंटे सो सकता हूँ!इन्ही लोगो को मेरे आराम से परेशानी है, वैसे जगाने  पर मैं इन्हे भावनात्मक रूप से डरता हूँ,ये करेंगे भी क्या डर  भी जाते है!

               आज के समय मे बचपन के ये दोनो मुहावरे ही हमारे सुखी जीवन का आधार बने हुए है!चाहे तो आप भी आज़मा कर देखिए दुनिया के सारे दुखों परेशानियों से आपको छुटकारा मिल जाएगा!