टूटे-छूटे बिखरे-सिमटे पल

फिर खोज रही हूँ,
वो टूटे-छूटे, बिखरे-सिमटे पल,

जिनको हमने जाने मे,
कभी अनजाने मे,
छुपा दिया था,
कभी आँसू मे,
कभी मुस्कान मे,

वो हर एक पल,
कुछ कह रहा है,
कभी ज़ोर से,
कभी चुपके से,

कुछ आवाज़े जो हल्की है,
उनको फिर से, ज़ोर से सुनना है,
जो, ज़ोरों से कनों से टकराती है,
उनको हल्का करना है,

तुम साथ हो निधि के ,
इसलिए..
बिखरे पलों को समेटना है…
मेरी उलझनों को,
तुम्हारे हाथो से, सुलझना है…
क्योंकि…
उन टूटे-छूटे, बिखरे-सिमटे पलों को,
प्यार मे बदलना है…  

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श्वेत मखमली चादर मे…

फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे,
एक ही रंग दिखता है,
श्वेत-श्याम एक-दूजे संग,
देखो कितना जचता है…

एक रंग मुझे, बंद आँखों से भी,
स्पष्ट दिखता जाता है,
सारे रंगों को जो,
फीका करता जाता है,

जब सुर्ख लाल रंग,
तुम्हारे प्यार का,
श्वेत मखमली चादर मे,
फैला-बिखरा सजता है…

श्वेत-श्याम एक ही, होकर…
सुर्ख लाल मे, छिपता है…
फैली-पसरी, श्वेत मखमली चादर मे…
एक ही सिंदूरी रंग दिखता है…

नवयुवती

सड़क के गढ्ढों मे, डोलता हुआ, आटो चला जा रहा था,
एक स्टॉप मे, नवयुवती के चढ़ते ही, सारी नज़रे उस पर टिक गयी,

कुछ मनचलों ने, दो-चार ओछे शब्द उस पर गढ़ दिए,
जो ना बोल पा रहे थे, उनकी  नज़रों ने ही, शब्दों को  गढ़ दिया,

थोड़ी ही दूर पर, एक बाईक, ऑटो के साथ हो ली,
माज़रा  समझते देर ना लगी, 

आटो के सामने, उन मनचलो ने, गाड़ी अड़ा दी,
चालक के,  ऑटो रोकते ही, लड़ाकों ने लड़की को खीचने की कोशिश की,

ऑटो वाले ने हाथ जोड़कर लड़की से कहा,
बेटी मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, रोज़ रोज़ के तुम्हारे इस अपमान से, मरणासन्न हो रहा हूँ,

जवान लड़के ही क्या, औरते भी तुझे साथ नही देती है,
अच्छा होता जो, तू बीमार माँ की, दावा और भाई की पढ़ाई के लिए,  इनके बाप से, उधार ना लेती,

हर किसी को, तुझमे ही बुराई नज़र आती है,
क्योंकि तू, जवान सुंदर लड़की, इनकी बेटी या बहन नही, पराई है,

तुझे सब ताने मार जाते है, नज़रों से तेरा चरित्र गिरा जाते है,
इन मनचलों के, इरादों को, बुलंदी दे जाते है,

एक आवाज़ भी तेरी, तरफ नही उठती है, 
तू ,रोज़ रोज़ ये अपमान,  कैसे सहती है?

लड़की ने उतरते हुए भी कुछ ना कहा,
एक क्रोध भरी नज़रों से, सबको देखा,

जो नज़रें उसे ताने मार रही थीं,
मानों धरती मे दबी जा रही थीं,

बिन कहे ही, उसकी नज़रों ने, हम सबको पानी कर दिया,
उसकी तीखी मुस्कान ने, हम सबको बेज़ुबान कर दिया…

एक बचपन उसने जिया (बाल दिवस विशेष)

एक कमरा सपनो  भरा,
फर्श मखमली, छत सितारों भरीं,
दीवारें रंगों सजीं, खिड़कियाँ फूलों रंगीं,

सपने कहीं उँचे की, आकाश भी कम लगे,
ज़मीन कहीं मखमली की, बाल भी शूल लगे,
एक बचपन उसने जिया, जिसे सब कुछ कम लगा,

एक कमरा, कुछ टूटी-मूटी, सीकचों से बना,
फर्श चुभता, बहती-रिसती छत,
दीवारें उधड़ी, रंग बही, खिड़कियाँ शूलों सजीं,

सपने बस इतने की, आकाश तले छाँव मिले,
ज़मीन बस इतनी रहे, की पैरों तले से  न हटे,
निधि “एक बचपन उसने  भी जिया, जिसे कभी कुछ भी ना मिला….

 

सूरज की पहली किरण

भरी धूप मे, आज ऑफीस जाते समय ही उसने सोच लिया था, शाम को घर वापस जाते समय, आज मंदिर जाऊंगी…
मंदिर मे हाथ जोड़े खड़े, मन न जाने कितनी पूरनी बातों और यादों से भर गया… आँखों से फिर कुछ आँसू गिर गये, सिर पर रखा दुपट्टा संभालते हुए, साथ ही आँसू भी पोछ लिए… पीछे से एक आवाज़ आई, चलो घर, बहुत देर हो गयी, पिछले नौ सालों से तुम यहाँ आती हो और न जाने कहाँ-कहाँ जाती हो, तुम्हे क्या मिला?

घर पहूचकर ठंडा पानी पी ही रही ही थी की, फ़ोन की घंटी बज़ उठी… एक २ दिन का बच्चा, मरणासन्न अवस्था मे, हॉस्पिटल मे पड़ा है, आना है क्या उसे देखने? पानी आधा ही छोड़कर, अपनी बात आधी-अधूरी समझाती हुई, पति को साथ चलने कह  निकल पड़ी… कितने सालों से, अपने सभी  आत्मीय लोगों को समझा रही थी, कितना इलाज करवाया, आधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया… शारीरिक और मानसिक तकलीफ़ के अलावा कुछ भी न मिला… अती शिक्षित, अती आधुनिक सोच वाले परिवार का हिस्सा होते हुए भी, अपनी बात, अपनी सोच से किसी को भी बदल नही पा रही थी… यहाँ तक की, हर कदम पर साथ देने वाले अपने जीवन साथी को भी समझाने मे असफल थी… नौ सालों का लंबा, एकाकी सफ़र, सब कुछ होते हुए भी कोई कमी, उसे अंदर से खोखला कर चुकी थी…

हॉस्पिटल मे पहुचते ही, जैसे बच्चे को देखा, लगा की कल, सूरज की पहली किरण भी ना देख पाएगा, पर मन से कहीं आवाज़ आई, इस माह मिली तनख़्वा अगर खर्च भी कर दूं और शायद बच्चा बच जाए, तो एक माँ को उसका बच्चा मिल जाए… जो सुख मुझे ना मिल पाया, वो इस ग़रीब को मिल जाए…उस औरत के साथ  dr. से मिलने गयी… dr. ने खर्चा बताने के पहले ही ये बात दावे से कह दी, अड़तालीस घंटे निकलना असंभव है… रुपये लगाने के पहले सौ बार विचार कर लें, वो बेचारी  ग़रीब औरत ये सुनकर ही लापता होगा यी, माँ का दिल जो था..

न जाने क्यों उसकी इक्षा शक्ति या प्यार देखकर, पति ने साथ दिया… दोनो ३दिनों तक उसके सिराहने बैठे रहे… ३दिनों बाद सूरज की पहली किरण के साथ जब उस मासूम ने आँखें खोली तो, इन्हे सब मिल गया, कई दिनों की क़ानूनी कार्यवाही के बाद आज “सूरज” आपनी माँ के आँचल मे निकला…   

-एक दिए की रौशनी तले- (दीपावली त्यौहार)

दीपावली की रात… एक घर मे…

छोटी-छोटी बेटियाँ, माँ का हाथ बटा रही है,
घर मे रंग-रोगन कर, पकवान बना रही है,

बेटा रात मे जुआ खेलते पकड़ा गया है,
पिता से, जेल के, चक्कर कटवा रहा है,

बहू को, पहली ही दीपावली मे,
दहेज के नाम, पटाखों के हवाले कर दिया है,

दीपावली रौशनी का त्यौहार है,
हम सबने साबित कर दिया….

किसी घर से, मीठे के डब्बे, बासे होने पर, फेंके गये,
कोई, कई रातों बाद, आज भी, भूखा सोया है,

किसी घर बच्चो ने ३,४ जोड़ी कपड़े बदले थे,
किसी के तन मे आज भी, चिथड़े नही थे,

किसी अमीर ने आज, कुत्ते का घर भी सजाया,
किसी ग़रीब की, बरसों से टूटी झोपड़ी मे, आज भी अंधेरा छाया है ,

दीपावली रौशनी का त्यौहार है,
हम सबने साबित कर दिया….

कोई बहुत खुश है की, बेटी टी.वी. मे आ रही है,
तो क्या, अंगप्रदर्शन, गाली- गलौच कर पैसे कमा रही है,

कोई बहुत खुश है की, बेटा विदेश मे नौकरी कर, नाम कमा रहा है,
तो क्या, बरसों से, दीपावली मे रुपये भेज कर, कर्तव्य निभा रहा है,

नाती-पोते दीपावली मे, महँगे उपहार माँगते है,
एक दिन दीपावली मना, बूढ़ो से निजात पाते है,

दीपावली रौशनी का त्यौहार है,
हम सबने साबित कर दिया….

हे लक्ष्मी मैय्या! तू हर बार “निधि” को जीवन के, नये रूप दिखाती है,
एक दिए की रौशनी तले, कितना अंधेरा है, तू समझा जाती है…

तुम

तुम बहुत मीठा बोलते हो,
हर शब्द को, चाशनी मे घोलते हो,
मिशरी की तरह, रस घोलते हो,

न कड़वा बोलते हो,
न शब्दों के तीर चलाते हो,
बिन कुछ बुरा कहे ही,

मीठे शब्दों मे ही,
कड़वा सच सुनाते हो,