एक और राष्ट्रीय पर्व आया था… (राष्ट्रीय पर्व,२६ जनवरी,गणतंत्र दिवस)

एक और राष्ट्रीय पर्व आया था…

सबने बड़ी बड़ी बातें की…
भाषण दिए, कविताएँ पढ़ी…
एक दूजे की देशभक्तिं की…
भावनाओं की सराहना की…
उत्तमाहात्वाकांक्षाओं की…
देश की उन्नति की बातें कीं…
वाह-वाह की और शुभकामनाएँ दी…

क्योंकि,
एक और राष्ट्रीय पर्व आया था…

ध्वजारोहण स्थान से निकलते ही,
कुछ ग़रीब, रोते-बिलखते बच्चे मिले,
फटी हुई सारी मे उनकी माँ मिली,
नशे मे धुत पिता मिला,

गली के कोनों मे, जुआ खेलता, युवा दिखा,
गंदगी से, बीनकर, खाना खोजने वाला, आज दिखा,
घर से बाहर, बीमार हाल मे, कल का बूढ़ा, बेहाल दिखा,

थोड़ी ही दूर मे,
गले मे माला, होठों मे पान, हाथ मे बीड़ी लिए,
किसी सरकारी अफ़सर को, गाली देता,
देशभक्ति का भाषण, देने वाला, नेता मिला,

देश का भविष्य, बच्चे, किताब के बोझ से दबा दिखा,
देश का आज, युवा, मोटर बाईक मे, लड़कियों को, छेड़ते दिखा,

शिक्षक जल्दी मे, कार्यक्रम समाप्त करके, भागते मिले,
बाकी लोग अपने घरों मे, सोते या फालतू कार्यक्रम देखते मिले,

चौराहों मे १२, १ बज़े तक, देशभक्ति के गाने बज़े,
सब्र का बँधा टूटते ही, आधुनिक, फूहड़ गाने लगे,

कुछ ने फिल्म देखने का मन बनाया था,
कुछ ने पूरे दिन आराम करने मे निकाला था,

क्योंकि,
एक और राष्ट्रीय पर्व आया था…

अराजकता, भ्रष्टाचार, कालाबाज़ारी, अशिक्षा, बे कारी, भुखमरी, लाचारी….
क्यों हमने बचपन से, आज तक जानी है…
उससे फिर, मिलकर, अनजान बनने का, समय आया था…

और
कविताओं, भाषणों और भावनाओ को,
फिर अलगे साल तक, भुलाने का समय आया था…

क्योंकि,
एक और राष्ट्रीय पर्व आया था…

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4 टिप्पणियाँ

  1. bahut sahi kaha…aajkal ki vastvik stithi par likhi poem…keep it up

  2. बहुत सुंदर .. आभार

  3. bahut khoob, sab kuch sach laga is kavita me.

  4. behtreen


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