नवयुवती

सड़क के गढ्ढों मे, डोलता हुआ, आटो चला जा रहा था,
एक स्टॉप मे, नवयुवती के चढ़ते ही, सारी नज़रे उस पर टिक गयी,

कुछ मनचलों ने, दो-चार ओछे शब्द उस पर गढ़ दिए,
जो ना बोल पा रहे थे, उनकी  नज़रों ने ही, शब्दों को  गढ़ दिया,

थोड़ी ही दूर पर, एक बाईक, ऑटो के साथ हो ली,
माज़रा  समझते देर ना लगी, 

आटो के सामने, उन मनचलो ने, गाड़ी अड़ा दी,
चालक के,  ऑटो रोकते ही, लड़ाकों ने लड़की को खीचने की कोशिश की,

ऑटो वाले ने हाथ जोड़कर लड़की से कहा,
बेटी मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, रोज़ रोज़ के तुम्हारे इस अपमान से, मरणासन्न हो रहा हूँ,

जवान लड़के ही क्या, औरते भी तुझे साथ नही देती है,
अच्छा होता जो, तू बीमार माँ की, दावा और भाई की पढ़ाई के लिए,  इनके बाप से, उधार ना लेती,

हर किसी को, तुझमे ही बुराई नज़र आती है,
क्योंकि तू, जवान सुंदर लड़की, इनकी बेटी या बहन नही, पराई है,

तुझे सब ताने मार जाते है, नज़रों से तेरा चरित्र गिरा जाते है,
इन मनचलों के, इरादों को, बुलंदी दे जाते है,

एक आवाज़ भी तेरी, तरफ नही उठती है, 
तू ,रोज़ रोज़ ये अपमान,  कैसे सहती है?

लड़की ने उतरते हुए भी कुछ ना कहा,
एक क्रोध भरी नज़रों से, सबको देखा,

जो नज़रें उसे ताने मार रही थीं,
मानों धरती मे दबी जा रही थीं,

बिन कहे ही, उसकी नज़रों ने, हम सबको पानी कर दिया,
उसकी तीखी मुस्कान ने, हम सबको बेज़ुबान कर दिया…

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5 टिप्पणियाँ

  1. रचना की परिणति कुछ और स्पष्ट और सुन्दर हो सकती थी …

  2. सुन्दर रचना, और खिलदड़े भाव………..वाह

  3. सार्थक चित्रण, मन को छू गये आपके भाव।
    ——————
    ये तो बहुत ही आसान पहेली है?
    धरती का हर बाशिंदा महफ़ूज़ रहे, खुशहाल रहे।

  4. एक स्त्री ही सबसे अच्छी तरह किसी स्त्री की भावनओं को समझ सकती है | समाज में व्याप्त विषमताओं और स्त्री के संघर्ष को तुमने अलग तरह से प्रस्तुत किया किया है | बधाई…

  5. बात ठीक से अभिव्यक्त नहीं हो पाई…
    पर भाव पहुंच रहे हैं…

    सरोकार स्पष्ट हैं…
    बेहतर


टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है.

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