अब

1) पहले :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
तुम मेरे दिल तक आए,
कुछ यूँ समाए की,
दूजी, सारी दस्तकें, सारी आहटें,
मुझसे कोसों परें हो गयीं…

2) कुछ दिन पहले तक :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
मुझसे दूर हुए, दूर भी इतने की,
दूजी, हर दस्तक, हर आहट,
मेरे कानों मे गूंजा करती,
तुम्हारी दस्तक, तुम्हारी आहट नही,
ये कहा करती थी….

3) अब:-
ना दस्तक, ना आहट है,
ना दरवाज़े पर नज़रे टिकी है,
ना किसी आवाज़ की पुकार है,

मैं अपने मन की राह चुनूंगीं

मैने कयी बार,
कभी अपनों के,
कभी तुम्हारे कहने पर,

नयी सुबह का इंतज़ार किया,
नयी माला मे फूल गुथे,
नयी रंगों की रंगोली भरी,
नयी खुशबू से घर महकाया,

नयी सुबह जब भी आई,
पूरानी काली रातों की,
छीनी ही सही, चादर ओढ़ के आई,

नयी माला के फूल,
कुछ पल मुस्कुराकर,
मुरझा जाते है, शाम तलक़,

नयी रंगों की रंगोली,
रंगों को बेरंग कर,
बिखरती है, कुछ ही पल मे,

नयी खुशबू घर को मेरे,
महकाकर, सारे कोने,
हवा हो जाती है, पल भर मे,

अब ना अपनो की, ना तुम्हारी सुनूँगी,
मैं अपने मन की राह चुनूंगीं,

जब भी सुबह आएगी,
नयी माला तुझको अर्पण करूँगी,
एक ही रंग की, रंगोली बनाकर,
सच्ची खुशबू- सच्चे रंगो से,
अपने घर-जीवन को भरूँगी,

वो सुबह ही, मेरी होगी,
वो माला की, भीनी खुशबू,
वो रंगोली का, एक ही रंग,
मेरे घर और जीवन को सजाएगा…

हाँ, “निधि”मन की राह चुनूंगीं,
ना अपनो की, ना तुम्हारी सुनूँगी 

कुछ पंक्तियाँ

चलते थे जिस ज़मीं पर, संभल संभल कर हम,
सरकी वही ज़मी  नये कदम उठाने के पहले,

आसमान से तो पानी बरसता था अक्सर,
आग ही बरसी जब हम निकले  बिन तैइय्यारी के,

रौशनी रहती थी हर रोज़ ही दिन मे,
ग्रहण ही लगा सूरज को जब  हम दिन मे निकले,

तेरे इंतज़ार मे…

हम तेरे इंतज़ार के आदि है,
ये जानकार तुम,
ना जाने कब तक इंतज़ार कारवाओगे?
इस इंतज़ार मे ही जीना है,
किस्मत हमारी.
ये मानकर तुम,
ता उम्र हमको सताओगे,
अब नही है शिकवा,
इस इंतज़ार से,
के जीना खुशी से है,
तेरे इंतज़ार मे…