संघर्षों का जीवन ये उस दिन पूरा हो जाएगा

नन्ही, कोमल सी, पंख पसारे,
उड़ती थी  स्वछ्न्द गगन मे,

हवाए ठंडी लगती थी,
नील गगन दिखता था,

ना कोई डर, ना जीझक,
सब कुछ सुनहरा दिखता था,

सपने सजाने की ललक,
हार को जीतने का जुनून,
लगता था सब कुछ जीत लेगी…

समय ने करवट ली है…

रोज़ आकर लड़ती है,
वो अपने ही वज़ूद से,

ना जाने खुद से ख़फा है,
या दुनिया से,

टकराती है एक दर्पण से,
जो उसका चेहरा दिखता है,
संघर्षों से लड़ लड़ कर कठोर हो चुकी है…

माथे की लकीरें मुश्किल भारी राहें  बताती है,
चेहरे  की रूढ़ता अपनी ही कहानी कहती है,

ना जाने कब तक यूँ लड़ना ही होगा?
ना जाने कब तक अपने चेहरे को ना पहचानना होगा?

संघर्षों को ही जीवन कहते है अगर,
तो ये जीवन यूँ ही, लड़ कर जीना होगा…

संघर्षों का जीवन ये, उस दिन पूरा हो जाएगा,
जिस दिन दर्पण टूट जाएगा या,
उसका वज़ूद मिट जाएगा….

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One Comment

  1. nice poem…but it’d be great if u be more relexed while writing. check out amanstemcell.blogspot.com:)


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