छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

छोटे छोटे सपने थे,
पास मेरे सब अपने थे,
न थी चाह, आसमान मे उड़ाने की,
धरती ही मेरी अपनी थी,

बड़ा सोचो, बड़े सपने देखो,
जो चाह न मेरे अपनी थी,

जीना था, तो अपनो से लड़ना था,
जीतना था, तो अपना सब हराना था,
ये राह न मेरी अपनी थी,

सपने देखे, जिए और पूरे किए,
लड़ाई लड़ी और जीती भी,
राह मे आगे और आगे बढ़ गये,

थोड़ा ठहरकर जो सांस ली,
बड़े सपने, जो न दिल के थे,
सब पूरे हो गये,
छोटे सपने, जो दिल के अपने थे,
सब अधूरे रह गये,

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?
मेरे सब अपने कब दूर हो गये?
आसमान का तो कोई छोर नही,
पैरों के नीचे की धरती, भी खिसक गयी…

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

 

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2 टिप्पणियाँ

  1. “छोटे , छोटे सपने कब बड़े हो गए ?”…..निधि , मैंने तो आजतक बड़ा सपना देखा ही नही ….मैंने तो अपने लिए सपने देखेही नही …अपनों के लिए देखे ..! लेकिन जब उनके सपने पूरे नही हुए तो इलज़ाम मुझ पे लगे ….!
    कितना अनुभव संचित दर्द छुपा है,निधी, आपकी इस रचना में…एक आह निकली है दिलसे..!
    यही विडम्बना है ज़िंदगी की …

    duaa karte hun, ye kewal rachna tak seemit ho, aapkee zinagee me na shamil ho..!

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  2. छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?
    सपने तो बडे होंगे ही — सच यही है
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति


टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है.

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