मैं अब जीने लगी हूँ…

कुतर दिए है, पंख अपने,
जिनसे उँची उड़ान भारी थी,
नील गगन मे, स्वच्छन्द उड़ चली थी,

तोड़ दिए है, सब सपने,
जिनमे सौ रंग भरे थे,

सपने सजाकर,
पंखों को पाकर,
दूर बहुत-दूर हो गयी थी, अपनो से,

न दुख की पुकार,
मुझ तक आती थी,
क्योंकि…सपनो मे ही खुश थी,

न छोटी-छोटी खुशियों मे,
अपनो संग हो पति थी,
क्योंकि…दूर उड़ चली थी,

रंगीन सपनो और उँची उड़ान के,
बोझ के तले, दबने-घुटने लगी थी,

अब…

वापस धरती मे चलने लगी हूँ,
सपनों से बाहर, सच की दुनियाँ मे जीने लगी हूँ,

अपनो के करीब आ गयी हूँ,
सुख मे सुखी और दुख मे दुखी होने लगी हूँ,

क्योंकि…

मैं अब जीने लगी हूँ…

 

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2 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. मैं अब जीने लगी हूँ…
    आशा के भावो का संचार करती सुन्दर रचना

  2. aapki last creation kaafi sad type thi,jabki ye bahut ashaavaadi hai…critically main ise aapki writing abilities ki variety ke roop me dekhta hoon…likhte rahiye


thanks a lot.

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