आज फिर मन उदास है,

आज फिर मन उदास है,
कोई अपना नही पास है…

              चल रही हूँ जिन रहो मे,
              कभी फूल है कभी काँटे है…

काँटों से दामन छलनि हो जाए,
पर फूलों की मुझे आस है…

              रात के आँधियारों से डर क्या मुझे, 
              धूप की तपन की आदत है मुझे…
 
बारीशों मे भी जिसने जलना सीखा,
तूफ़ानों से उसे कुछ आस है…

             परयों से डर क्या मुझे,
             डर  तो अपने आप से है..

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One Comment

  1. बहुत सुंदर कविता पर कुछ अधूरी सी ।


टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है.

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