अंतर क्यो ?

हम सभ्य भारतीय समाज मे रहने वाले, वो संस्कारी लोग है, जो स्वयं को शिक्षित, ज्ञानवान और एक अच्छे स्तर मे रहने वाला पड़ा-लिखा वर्ग मानते है ! यह मानने के हमारे पास बहुत से कारण भी है ! हम पड़े-लिखे, डिग्रियाँ बटोरे लोग है, जिनके पास ऊचा पद, नाम, मान-सम्मान है! सामाजिक-स्तर से हम अच्छी पहुच रखते है! हमारे बच्चे पड़े लिखे है,अच्छी नौकरियों मे है, कुछ तो विदेशों मे भी है!  सत्य है, अगर आपके पास ये सब है तो समाज मे आप एक सम्मानित व्यक्ति की ज़िंदगी जीते है!

१) पर हम मे से,ऐसे कितने लोग है, जो सच मे अपनी सोच को ऊचा करने  मे कामयाब हो सके है? “ऊचा” इसलिए क्योंकि, हम सभी व्यक्तियो के लिए एक सी सोच नही रखते, वो हर व्यक्ति के अनुसार बदल जाती है|

२) हम मे से कितने लोग है, जो कुच्छ अच्छी बात सीख कर, उसे अपनी ज़िंदगी मे उतारने का प्रयास ही करते है? “प्रयास” इसलिए क्योंकि  जो सारी अच्छाई सीख जाए वो तो महान ही होगा!

३) ऐसे कितने लोग है जिनकी कथनी और करनी मे बहुत कम अंतर होता है? “बहुत कम” इसलिए क्योंकि जिनकी कथनी और करनी मे  अंतर ना हो वो तो शायद आम इंसान ना हो!

इन सवालों के जवाब आप खुद ही खोज़ सकते है! आप पता कर सकते है की, आप जो अपने बारे मे सबको जताना चाहते है, वो आप है भी  या नही? क्या आप जो नही है, केवल वो दिखना चाह रहे है? यदि ऐसा है तो आईए एक बार विचार करें!

  • आज हम सब कहते है की लड़के-लड़कियाँ एक बराबर है, पर क्या हम ये बात मानते है? अच्छे-अच्छे पड़े-लिखे घरों मे बेटा होने  के लिए  कई तरह के प्रयास किए जाते है! दिखावे के लिए हम ये ज़रूर कहते है की, कुछ भी हो आजकल सब एक बराबर है! पर  प्रयास सबका यही  रहता है की, बेटा हो! कारण सबके अलग-अलग हो सकते है, पर चाह वही, बेटा हो!
 
  • हम कहते ज़रूर है की, “बेटी और बहू मे कोई अंतर नही” पर जब पारी आती है तब, “बहू कभी बेटी नही बन सकती” ये कहकर पल्ला झाड़ लेते है! ये प्रयास नही करते की बहू को बेटी कैसे बनाए? जब वही काम बेटी करे तो कहते है की धोखे से हो गया, सीख जाएगी! पर जब  बहू की पारी आती है तो बात बदल जाती है!

 

  • जब हम कहते है की “हमे दहेज नही चाहिए”, और दूसरे पल यह कहते है की, आपकी बेटी की सुविधा के लिए जो समान उसे  चाहिए दीजिए, और इस तरह समान की लिस्ट लंबी करने मे कसर नही छोड़ते!मन मे ये बात ज़रूर आ जाती है की, हमारा बेटा योग्य है, दहेज मिलना ही चाहिए! माँगने के तरीके ज़रूर बदल जाते है पर चाह वही की, दहेज मिले!

 

  • हम अपनी मा-बहन की रक्षा की चिंता करते है और दूसरों की बहू-बेटियों को परेशन करते है!हम अपने घर की बातों को बाहर नही  जाने देना चाहते पर, दूसरों के घरों मे ताक-झाँक करते रहते है! दूसरों को तो आदर्शों का पाठ पड़ाते है, पर खुद एक का भी पालन  नही करते! जो सीख दूसरों को देते है उसमे से एक भी नही मानते! रामायण पड़ते, सुनते और सुनाते है, पर पालन करते है  महाभारत!

 

  • हम कहते तो ज़रूर है की, दूसरों की मदद करनी चाहिए, पर जब कोई हमारे पास आता है मदद के लिए, तो हम सोचते है की हमसे  मदद ले कर ये कही आगे ना निकल जाए? और उसे मदद नही करते! पर जब हमे मदद कि ज़रूरत होती है तो,सबके पास जाते है!जब आप दूसरों की मदद नही करोगे तो कोई और क्यों आपकी मदद करेगा!

 

  • कहा जाता है की, रंग-रूप, काम-रुपये के आधार पर भेद-भाव नही बरतना चाहिए, पर एक ही घर-परिवार मे व्यक्ति के रंग-रूप  और कार्य के अनुसार भेद-भाव बरता जाता है! यह चाहे हँसी-मज़ाक मे हो या तानों के रूप मे! तब आदमी ये क्यों भूल जाता है की, उसके ही हाथ की सभी अगुलिया भी बराबर नही होती है!

 

  • विदेशी सन्स्क्रति के प्रभाव मे वहाँ का पहनावा और भाषा तो सीख जाते है, पर नियम-क़ानून, काम करने का तरीका, उन्नति के  रास्ते, सुधार के प्रयास नही सीखने की कोशिश करते!

 

  • हम विदेशों की जो बड़ाई करते है, क्या उनमे से कुछ अपने देश मे लाने की कोशिश करते है?  शायद नही, क्योंकि हम विदेशों मे  जाकर वहाँ क्या-क्या अच्छा है ये तो बहुत बताते है, पर वहाँ की एक भी अच्छी बता अपने साथ नही लाते! इसका एक अच्छा सा  उत्तर हमारे पास ज़रूर होता है, वो ये की, हमारे यहाँ के लोग कुछ नही कर सकते!  हमारे देश मे ऐसा ही रहेगा,कुछ नही बदलेगा!क्यों भाई क्या हम अपने देश मे जा कर उसी सख्ती के साथ सारे नियम-क़ानून मानते है, जैसे हम विदेशों मे पालन करते है? नही, वरण देश मे  आकर हम भी ग़लतियाँ करनी और गिनानी शुरू कर देते है! दूसरों को समझाने के बजाए हम खुद भी वही हरकते करते  है और खुश होते है की विदेश मे ये सब करने नही मिला!

 

  • दूसरों को कहते पाए जाते है की, ये करो वो करो और जब हमारी पारी आती है तो यही कहते है की, हमारे अकेले के करने से क्या  होगा? बाकी तो कोई नही कर रहा है! तब हम ये भूल जाते है की, “बूँद-बूँद  से ही घड़ा भरता है!”

अगर हमारे विचारो मे और कार्यो मे उपरोक्त प्रकार की भिन्नता  है तो हमे अपने विचार , सोच , मन तथा कार्य को बदलने की ज़रूरत है जिससे हम सही मायनो मे शिक्षित, संस्कारी, ज्ञानवान बनकर एक अच्छे समाज का निर्माण कर पाएँगे  |

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