बहुत कोशिश की

कदमों से कदमों को, मिलाने की बहुत कोशिश की,
कभी मैं आगे बढ़ गयी, कभी तुम पीछे रह गये,

बातों को बातों से, मिलाने की बहुत कोशिश की,
कभी मैने कड़वी बातें कहीं, कभी तुम मीठी कह गये,

विचारों से विचारों को, मिलाने की बहुत कोशिश की,
कभी मेरे ओछे-हल्के हो गये, कभी तुम्हारे बड़े-गहरे हो गये,

मन से मन को, मिलाने की बहुत कोशिश की,
कभी मेरा मन छल गया, कभी तुम्हारा सागर सा गहरा हो गया,

“निधि” हर कदम मे, तुमसे पीछे रह गयी,
तुम हर कदम, मुझसे भारी पड़ गये…

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5 Comments Leave a comment.

  1. Jithne bhi comment likhe gaye , unke ssamne mai tho kuch nahi

  2. “निधि” हर कदम मे, तुमसे पीछे रह गयी,
    तुम हर कदम, मुझसे भारी पड़ गये…

    wah!!!! bahut hi sundar nazm!!

  3. Jo samarpan MIRA mai tha, usi ki jhalak aapki kavitaon mai milti h, bus thoda aadhunik tarike se. good. keep it up.

  4. Nidhi,
    Busy Schedule होने के कारन तुम्हारे Blog में थोड़े समय बाद आना हुआ….मेरा मानना ये है कि poem में भी इंसान की तरह ही गुण और अवगुण होते हैं,और इस poem में मुझे विनम्रता, अहं (ego) और अंहकार का न होना, ये ही गुण दिखाई देते हैं Nice,Simply Down to Earth, Keep it Up…..

  5. बहुत ही सुंदर ।


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