अब

1) पहले :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
तुम मेरे दिल तक आए,
कुछ यूँ समाए की,
दूजी, सारी दस्तकें, सारी आहटें,
मुझसे कोसों परें हो गयीं…

2) कुछ दिन पहले तक :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
मुझसे दूर हुए, दूर भी इतने की,
दूजी, हर दस्तक, हर आहट,
मेरे कानों मे गूंजा करती,
तुम्हारी दस्तक, तुम्हारी आहट नही,
ये कहा करती थी….

3) अब:-
ना दस्तक, ना आहट है,
ना दरवाज़े पर नज़रे टिकी है,
ना किसी आवाज़ की पुकार है,

One Comment

  1. आप जो लिख रही हैं… कई बार उसे कहना लिखना या ये कहें कबूलना खासा मुश्किल काम होता है… बधाई की आप उस काम को बहोत खूबसूरती से अंजाम दे रहीं हैं…!!
    शुभकामनाये..!!!
    http://www.nayikalam.blogspot.com


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