चलते थे जिस ज़मीं पर, संभल संभल कर हम,
सरकी वही ज़मी नये कदम उठाने के पहले,
आसमान से तो पानी बरसता था अक्सर,
आग ही बरसी जब हम निकले बिन तैइय्यारी के,
रौशनी रहती थी हर रोज़ ही दिन मे,
ग्रहण ही लगा सूरज को जब हम दिन मे निकले,
चलते थे जिस ज़मीं पर, संभल संभल कर हम,
सरकी वही ज़मी नये कदम उठाने के पहले,
आसमान से तो पानी बरसता था अक्सर,
आग ही बरसी जब हम निकले बिन तैइय्यारी के,
रौशनी रहती थी हर रोज़ ही दिन मे,
ग्रहण ही लगा सूरज को जब हम दिन मे निकले,
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