मैं नदी थी
प्यासी सी
तुम सागर से
मिलने चली थी
मिलकर सागर मे ये जाना
मैं ही अकेली, प्यासी नही थी
सागर तुम भी तो, कुछ प्यासे थे
विशाल हृदय के तुम स्वामी
कुछ तो तुम भी खाली थे
मिलती हो मुझ जैसी
सौ नदियाँ तुमसे, पर
मेरी भी प्रतीक्षा, करते थे
शांत-गंभीर और परिपक्व
तुम सदा ही दिखाते थे
कितने चंचल-कोमल
तन-मन के हो स्वामी
मिलकर तुम सागर मे, ये जाना
अथाह जल तुम्हारे अंदर
अपर सीमा के तुम स्वामी
तुम भी थे, कुछ प्यासे-प्यासे
राह मेरी भी, ताकते थे
मीठे-सादे और निर्मल जल की
चाह तुम्हे भी रहती थी
मिलकर तुम सागर मे ये जाना
तुममे मिलती हों
कयी नदियाँ मुझ जैसी
पर प्यास तुम्हारी भी
बुझती नही थी
तुम संग मिलकर
अपने रूप को खोती
तुम्हारा खारापन भी अपनाती
अपनी प्यास बुझाने
तुम्हे मीठी कर जाने
तृप्ति देने और पाने ख़ातिर
हर बार तुमसे ही, मिलने आती हूँ
तुम्हारा खारा ही स्वाद सही
पर तुममे ही तृष्णा पति हूँ