# चंद दिनों के लिए, क़र्ज़ पर जो ली थी #

चंद दिनों के लिए, क़र्ज़ पर जो ली थी,
तुम्हारी हँसी, अपने लबों पर,
उसको  मैने आज उतार दिया,
हँसते रहने के उस दर्द को,
चहरे से दूर किया,
मेरे मन के सारे दुखों को खो दिया!!!

चंद दिनों के लिए, क़र्ज़ पर जो ली थी,
तुम्हारी छबि, अपनी छबि पर,
मन-दर्पण मे झाँकने पर,
दिखती थी, तुम्हारी छबि,
मन-दर्पण की दीवार से,
उस छबि को उतार दिया,
खुद की छबि के, गुमने के भय को,
कुछ कम किया!!!

चंद दिनों के लिए, क़र्ज़ पर जो लिए थे,
तुम्हारे नाम के कुछ अक्षर,
आधे-अधूरे उन अक्षरों को,
जोड़ती थी, आज मिटा दिया है,
अपने नाम के वज़न को,
कुछ हल्का कर लिया!!!

चंद दिनों के लिए, क़र्ज़ पर जो ली थी,
तुम्हारी राह ताकती आशाओं की सुनहरी रौशनी,
आशा के उस दीप को, ऊपर तक भरकर रखा था,
कुछ तेल गिरा कर, दीपक से,
बाति को सांस लेने, जगह आज दे आई हूँ,
कम रौशनी मे, जीने के गुण को सीख आई हूँ!!!

चंद दिनों के लिए, क़र्ज़ पर जो ली थी,
तुम्हारे सपनो की प्रीत,
उन सपनो को, आँखों मे रातों को पाकर,
सपनो मे तुमको लाकर, बेचैनी को पाती थी,
भारी आँखो से हटाकर सपनो को, दिन के उजलों मे,
आँखो के बोझ को, कुछ कम कर लिया है,
हल्की आँखों को खोलकर, जीना सीख लिया है!!!

चंद दिनों के लिए, क़र्ज़ पर जो लिए थी,
तुम्हारी आवाज़, होती थी वही आस-पास,
उस आवाज़ मे अपनी, आवाज़ छुपाई थी,
उस आवाज़ की ज़दूगरी मे, सारी दुनियाँ भुलाई थी,
हटाकर तुम्हारे नाम की आवाज़ को,खुद की आवाज़ सुन पायी हूँ,
हर आती-जाती आवाज़ की पुकार सुन पायी हूँ!!!

चंद दिनों के, क़र्ज़ के तले,  खुद को, जीवन भर दबा   पाती हूँ…

जान कर ये सारे राज़…

क़र्ज़ जितनी जल्द हटाओ खुद से,
उतना ही सुखकर होता है,
वारना उस क़र्ज़ के तले,
सब कुछ घुटता रहता है,
उस सारी घुटन को,
मैं तेरी कर्ज़दार,
आज  उतारती हूँ,

हर क़र्ज़ से खुदको और तुझको मुक्त कर पाती हूँ !!!

तेरी ज़िंदगीं में कभी

तेरी ज़िंदगीं में कभी, धूप की तपन  हो,
हो ज़रा भी आशंका,
मेरा आंचल, तेरे सर पर हो,

तेरी राहों मे कभी, काँटों की चुभन न हो,
हो कंकड़ भी तो,
तेरे कदमों के नीचे, मेरी हथेली हो,

दुखों का कोई साया न हो,
गम की काली बदरी भी जो छाए,
खुशियों की बारिश करने, मेरी हँसी की बूंदे हो!

ज़िंदगी के किसी भी मोड़ मे,
तुझको न,
तनहाईयाँ,
रुसवाईयाँ,
गमों,
की हल्की सी छुअन भी न मिले!

तू आगे चला चल,
साथ खुशियों,
कामनाओ,
दुआओं,
आशीर्वदों का,
कारवाँ तेरे संग चलते रहे!

 

हाँ! हम-तुमसे,प्यार करते ही रहेंगे !!!

मेरी आँखों के बादल…
अब भी/कभी भी बरसते रहते है….
मेरे दिल के अरमान…
अब भी/कभी भी मचलते रहते है…
हाँ! हम-तुमसे, अब भी प्यार करते है!!!

मेरी सुहानी रातें…
अब भी/कभी भी करवट बदल कटती है…
मेरी नीदे अब भी/कभी भी अधूरी रहती है…
हाँ! हम-तुमसे, अब भी प्यार करते है!!!

मेरी सुबह की पहली किरणें…
अब भी /कभी भी नाम तुम्हारा ले आती है…
मेरी सिंदूरी गॉधुलि बेला…
अब भी/कभी भी सुर्ख रंग तुम्हारा भरती है…
हाँ! हम-तुमसे, अब भी प्यार करते है!!!

अब भी/कभी भी…
मेरे लबों की हँसी…
राज़ मेरे खोल जाती है…
मेरे नयनो की भाषा…
सब कुछ बोल जाती है…
हाँ! हम-तुमसे, अब भी प्यार करते है!!!

मेरे सपनों मे अब भी…
तुम्हारा आना-जाना चालू है…
मेरी बातों मे अब भी…
नाम तुम्हारा आता है…
हाँ! हम-तुमसे, अब भी प्यार करते है!!!

मेरी दुआएँ हर-पल…
तुम्हारे लिए होती है…
तुझको कोई आँच न आए…
यही पूजा धुन होती है…

मानो चाहे/ना मानो तुम…
जीवन के मोड़ मे जो फिर मिल जाओ कहीं…
अस्तित्व “निधि” का यही कहेगा…
हाँ! हम-तुमसे, कल भी प्यार करते थे/अब भी प्यार करते है/कल भी प्यार करते ही रहेंगे!!!

 

सुख मे ना सही , दुख मे मुझे हमेशा अपने पास पाओगे…

तपती धूप मे , दुख के तूफ़ानों मे
ग़म की परछाईयों मे , अंधेरी रातों मे
भटकी हुई राहों मे , अनजानी मन्ज़िल मे
तन्हाई की शामों मे , अकेली रातों मे
 
सुख मे ना सही , दुख मे मुझे हमेशा अपने पास पाओगे…

!!! तुम !!! आगे चल दोगे…

जानती थी,
तुम !!!

सुबह की पहली किरन  हो
जीवन मे उजाला कर
आगे चल दोगे

पहली बारिश की बूँदें हो
मेरी प्यास बुझा कर
आगे चल दोगे

पहले महके गुलाब की खुशबू हो
कुछ पल मेरे तन-मन को
महका कर आगे चल दोगे

पहली गुलाबी ठंड की ओस की बूँद  हो
पल मे मुझेसे फिसल जाओगे

 पहला प्रेम का फसाना हो
आज गीत बनकर
कल याद आओगे

फिर भी…
मैने इंतज़ार किया !!!
उस…

सुबह का
जिसके उजाले मे मैं नज़र आऊ

बारिश का
जिसमे जीवन की प्यास बुझे

खुशबू का
जो साँसों को महका जाए

फिर भी…
मैने इंतज़ार किया!!!

ओस की उस बूँद का
जो कुछ पल भर बाद सही
मुझसे फिसल जाए

उस गीत का
को जीवन भर गा सकूँ

जानती थी तुम आगे चल दोगे
फिर भी मै इंतज़ार मे हूँ….

 

छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

छोटे छोटे सपने थे,
पास मेरे सब अपने थे,
न थी चाह, आसमान मे उड़ाने की,
धरती ही मेरी अपनी थी,

बड़ा सोचो, बड़े सपने देखो,
जो चाह न मेरे अपनी थी,

जीना था, तो अपनो से लड़ना था,
जीतना था, तो अपना सब हराना था,
ये राह न मेरी अपनी थी,

सपने देखे, जिए और पूरे किए,
लड़ाई लड़ी और जीती भी,
राह मे आगे और आगे बढ़ गये,

थोड़ा ठहरकर जो सांस ली,
बड़े सपने, जो न दिल के थे,
सब पूरे हो गये,
छोटे सपने, जो दिल के अपने थे,
सब अधूरे रह गये,

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?
मेरे सब अपने कब दूर हो गये?
आसमान का तो कोई छोर नही,
पैरों के नीचे की धरती, भी खिसक गयी…

पता ही नही चला…
छोटे-छोटे सपने कब बड़े हो गये?

 

- मुझे मोक्ष लगे -

जिसे ये दिल प्यार करे
वो ये जान कर, मान जाए,
तो उसे जीने की, चाह कहते है…

ये चाह, जब कुछ इस तरह बढ़े,
की खुदा के पहले, उसका नाम आए,
तो इसे इबादत कहते है…

जो ये इबादत, इस तरह बढ़े,
की हर दुआ, उसके नाम हो जाए,
तो इसे दीवानगी की हद पार,
करना कहते है…

दीवनगी जब, यूँ हद पार करे,
की खुद की, सुध-बुध खो जाए,
इसे पागलपन की राह कहते है…

जो इस राह मे यूँ चले,
की काँटे भी, फूल लगे,
दूरी भी, पास लगे,
इसे जलने की आग कहते है…

ये जलन जब यूँ जले, की लगे,
ये दुनिया जले या मैं जलू ,
इसे मरने की चाह कहते है…

मरने की चाह जो यूँ जगे, की वो,
मुझे मोक्ष लगे,
उसे “निधि” कहते है….

मुझे मेरा चाँद,

तुम्हे पता है?
मुझे मेरा चाँद,
हर रोज़ दिखता है !!!

चाहे हर दिन घटे-बढ़े,
उतना ही रौशन,
उतना ही चमकीला,
उतना ही खूबसूरत,
मुझे मेरा चाँद,
हर रोज़ दिखता है !!!

अपनी तरफ खींचती है,
उसकी कलाएँ मुझे,
वो वही दमकता रहता है,
उसकी शीतलता,
शीतल करती मुझे,
वो वहीं दूर से ही,
मुझको ताकता रहता है,
मुझे मेरा चाँद,
हर रोज़ दिखता है !!!
 
हो अमावस की रात या,
पूनो का हो चाँद,
वो मुझे,
इस जहाँ से,
और उस जहाँ से,
हो बादलों मे छिपा या,
खूबसूरती मे फैला-बिखरा,
हर रोज़ दिखता है !!!

तुम्हे पता है?
मुझे मेरा चाँद,
हर रात को दिखता है,

– मैं कोई भी रीत न जानूं –

मैं कोई भी रीत न जानूं,
प्रेम के पथ की राह न जानूं,
पवित्र की प्यार की परिभाषा न जानूं,

सच/झूठ का भेद न जानूं,
पाप/पुण्य का भेद भी न जानूं,

असीम प्यार की सीमा न जानूं,
अर्पण/समर्पण मे भेद भी  न जानूं,

राधा/रुक्मणी/मीरा प्रेम मे  भेद न जानूं,
तन/मन/आत्मा के प्रेम की सीमा न जानूं,

प्रेम पथ की यही रीत जानूं…

प्रेम ही पवित्र दिखता है,
झूठ मे भी, सच दिखता है,
तन/मन/धन को देना अर्पण है,
मस्तक से नख तक, सब तुझको समर्पण है,

 

 

मेरा होना/न होना, कोई मायने नही रखता है !!!

मेरा होना / न होना, कोई मायने नही रखता है !
पर तेरा होना, मेरे लिए बहुत मायने रखता है !
तुम मुझे अपने जीवन के, हर पन्ने से  निकाल दो !
पर मेरा हर पन्ना, तुमसे शुरू, तुमसे ही ख़त्म होता है !
तुम बिना बोले, हर बार, अपनी बेरूख़ी जतलाते हो !
मैं बोल कर भी, अपने प्यार को नही दिखलापाती !
तुमने दूर जाने की क़सम, ज़िद से उठा ली है !
हमने भी तुम्हे भुलाने की, नाकाम कोशिश की है !
तुम मिटा भी दोगे, मेरा नाम हर एक जगह से !
मेरे मन से, अपना नाम कैसे मिटाओगे?
मैं जान गयी हूँ तुम क्या चाहते हो मुझसे?
मैं तुम्हारे लिए एक सफल कोशिश करूँगी !
भूले से भी तुमसे न मिलूंगी, न तुम्हे शर्मिंदा करूँगी !
गर टकरा भी गयी तो, अभी से भी ज़्यादा अनजान बन जाना !
धूल का कंकड़ समझ, पैरों से कुचल जाना !
और चाहे जो दिल तुम्हारा,
इस कंकड़ को पैरों के नीचे लाकर, अपने पैरों को न मैला करना!
तुम मुझसे बच कर निकल जाना !!!
क्योंकि…
मेरा होना / न होना, कोई मायने नही रखता है !!!

 

 

 

- कहा करते थे -

1)
“वो”, मुझसे, बेइंतहाँ प्यार करता था,
ऐसा वो और लोग मुझसे कहा करते थे,
मेरे कारण उसके लबों मे हँसी,
और आँखों मे पानी आया करता था,
ये हम भी देखा करते थे…
उसे प्यार से हम, “पागल” कहा करते थे…
2)
हमने कुछ महसूस किया/कुछ नहीं किया,
उसको नाकार कर, बहुत सारी बातें समझाकर,
ये भी मानकर की, हमने उन्हे समझा दिया है,
“बेवफ़ाई” का बोझ भी अपने दिल से हटाकर,
और ये मानकर/मनाकर की,
समय के साथ, “वो पागल”… भी समझ जाएगा,
अपना दिल हल्का कर हम आगे चल दिए…
3)
“उससे”, मैं, बेइंतहाँ प्यार करती हूँ,
ऐसा मैं और मेरे जानने वाले, मुझसे कहा करते है,
उसके कारण मेरे लबों पे हँसी,
और आँखों मे पानी आता-जाता रहता है,
ये वो भी देखा करते है…
प्यार से मुझे, “पगली” कहते है…

वो बेचैनी, वो तड़प, वो दर्द, वो ग़म…
वो आँसू, वो जलन, वो चुभन, वो तपन…

हम भी महसूस करते है, न जीते है/न मरते है…
उस बिन मेरी साँसे,रुक जाएँगी,ये जाना/माना करते है…
4)
उसने कुछ महसूस किया/कुछ नहीं किया,
हमको नाकार कर, बहुत सारी बातें समझाकर,
ये भी मानकर की, उसने हमे समझा दिया है,
“बेवफ़ाई” का बोझ भी अपने दिल से हटाकर,
और ये मानकर/मनाकर की,
समय के साथ, “ये पगली”… भी समझ जाएगी,
अपना दिल हल्का कर वो आगे चल दिए…
5)
“वो” जो मुझसे बेइंतहाँ प्यार करता था,
उसका दर्द, मेरे दिल मे समझ आता है अब…
जब…
“उसने” जिसे मैं प्यार करती हूँ,
मेरे प्यार को नाकारा है अब…

एक ही आवज़ आती है हमेशा…

एक बार मिलूं उससे,
जिसे मैने ठुकराया था…

एक बार उसे भी ठोकर लगे,
जिसे मैने अपनाया है…

जो मुझको महसूस हुआ?
क्या???
वो, उनको भी महसूस होगा?

एक दूजे की…
बेचैनी, तड़प, दर्द, ग़म…
आँसू, जलन, चुभन, तपन…
को समझेंगें?

एक-दूजे से मिलकर, मुस्कुराकर, जीवन की राह मे, आगे चल देंगे?

 

 

 

मैं अब जीने लगी हूँ…

कुतर दिए है, पंख अपने,
जिनसे उँची उड़ान भारी थी,
नील गगन मे, स्वच्छन्द उड़ चली थी,

तोड़ दिए है, सब सपने,
जिनमे सौ रंग भरे थे,

सपने सजाकर,
पंखों को पाकर,
दूर बहुत-दूर हो गयी थी, अपनो से,

न दुख की पुकार,
मुझ तक आती थी,
क्योंकि…सपनो मे ही खुश थी,

न छोटी-छोटी खुशियों मे,
अपनो संग हो पति थी,
क्योंकि…दूर उड़ चली थी,

रंगीन सपनो और उँची उड़ान के,
बोझ के तले, दबने-घुटने लगी थी,

अब…

वापस धरती मे चलने लगी हूँ,
सपनों से बाहर, सच की दुनियाँ मे जीने लगी हूँ,

अपनो के करीब आ गयी हूँ,
सुख मे सुखी और दुख मे दुखी होने लगी हूँ,

क्योंकि…

मैं अब जीने लगी हूँ…

 

मोक्ष को कैसे पाऊँ ???

मेरा आँचल तो काँटों का दामन है
पुष्पों का खिलाना तो  स्वप्न है
सूने इस आँगन  मे
महके फूलों के रंग
भर जाते…

जब यमुना पर कर तुम
नटखट बाल गोपाल
अटखेलियँ करने आते…

ग्वाला बन गोपाला तुम
गायों को चराने लाते
बंज़र धरती को
उर्वारा तुम कर जाते…

नटखट माखन चोर मदन
जब बनकर तुम
माखन और मिशरी स्वाद से खाते
घर मे भरा भंडार
अन्नपूर्णा कर जाते…

मेरे जीवन के आँधियारों को
घनश्याम तुम आकर
रौशन कर जाते…

मधुर स्मृतियों का
जीवन गान, तब बन पता
जब कान्हा तुम
बाँसुरी की तान सुनाते…

सूनी ये बगिया
तब व्रंदावन हो पति
जब कृष्णा तुम आकर
इसमे रास कर जाते…

यह आँचल पावन हो जाता
जब मेरे मन के, कन्स का
विष्णु रूप बनकर
दमन कर जाते…

मेरा घर भी,  द्वारका बनता
जब राजा रूप मे आकर
घर मेरा  पवित्र कर जाते…

न आ सकते तुम तो
भटके जीवन को
राह दिखला जाओ…

मोक्ष को कैसे पाऊँ
ये तो तुम बतला जाओ…

 

जो प्यार करते हो तुम भी उनको,तो ये जान लो…

तुम कहते हो,वो बेवफा हो गया है…
प्यार मे दर्द, हर रोज़ दे गया है…
कभी सज़ा देता है, तो कभी रुला देता है…

जो जानते हो ये की, वो तुमसे प्यार किया करते थे…
तो अब ये मान लो…

उसने कही ज़्यादा उन्हे ही ,”प्यार” करने का अब वक़्त आ गया है…
दर्द ए दिल जो मिला है तुम्हे, दर्द ए दावा तुम बन जाओ…

क्यों भूलते हो उन पलों को, जिसमे वो तुम्हे…
दावा भी बनते थे, कभी दुआ भी देते थे…

माना की…
वो न लाएँगे अपनी ज़ूबा पर कभी तुम्हारा नाम…
वो न करेंगे दुनिया के सामने अपने प्यार का इकरार…

तुम उनकी इस जीझक को बेवफ़ाई न मानलो …
जो प्यार  करते हो तुम भी उनको,तो ये जान लो…

वो दागा करे या वफ़ा करे प्यार मे…
तुम वफ़ा ही करो अपने प्यार से…

प्यार जब किया था तुमने…
क्या तब ये जाना  था तुमने…

वो तुम्हे प्यार ही करेगा…
जो प्यार करने के पहले तुमने ये ना जाना था…
तो अब क्यों अपना प्यार कम करते हो…
 
वो ना करे, जो टूटकर तुमसे प्यार…
तुम लुट कर भी उन्हे प्यार कर लो…

जितना प्यार मिला है तुम्हे…
उसका शुक्रिया करो…
जो न मिल सका उसे पाने की दुआ करो…

प्यार मे जो केवल पाना न चाहे…
देना भी सीखे…
तो उसक प्यार कभी वेवफा ना होगा…
तुम ये जान लो…

प्यार मे बदला नही लिया जाता है …
खुद को बदल दिया जाता है…
जो तुम ये मान लो, तो…
दिल का हर दर्द दवा बन जाएगा…
 

संघर्षों का जीवन ये उस दिन पूरा हो जाएगा

नन्ही, कोमल सी, पंख पसारे,
उड़ती थी  स्वछ्न्द गगन मे,

हवाए ठंडी लगती थी,
नील गगन दिखता था,

ना कोई डर, ना जीझक,
सब कुछ सुनहरा दिखता था,

सपने सजाने की ललक,
हार को जीतने का जुनून,
लगता था सब कुछ जीत लेगी…

समय ने करवट ली है…

रोज़ आकर लड़ती है,
वो अपने ही वज़ूद से,

ना जाने खुद से ख़फा है,
या दुनिया से,

टकराती है एक दर्पण से,
जो उसका चेहरा दिखता है,
संघर्षों से लड़ लड़ कर कठोर हो चुकी है…

माथे की लकीरें मुश्किल भारी राहें  बताती है,
चेहरे  की रूढ़ता अपनी ही कहानी कहती है,

ना जाने कब तक यूँ लड़ना ही होगा?
ना जाने कब तक अपने चेहरे को ना पहचानना होगा?

संघर्षों को ही जीवन कहते है अगर,
तो ये जीवन यूँ ही, लड़ कर जीना होगा…

संघर्षों का जीवन ये, उस दिन पूरा हो जाएगा,
जिस दिन दर्पण टूट जाएगा या,
उसका वज़ूद मिट जाएगा….

सच्चाई मे जीना,

रिश्ता चुना था मैने,
एक तेरा ही,
इस दुनिया मे,
अब उससे भी दूर होने का इरादा,
तुमने जो जाता दिया,
अच्छा है हमने भी,
यकीन करने मे,
समय ज़्यादा,
न गंवारा किया,
जो जीना है ता उम्र,
हमे यूँ ही,
सच्चाई मे जीना,
तुमने जल्द ही,
हमे सीखा दिया…

…ये अहसास ही मुझे कभी मरने नही देता…

प्यार एक अहसास है जो कभी कम नही होता

                             दिल बनकर सीने मे जो धड़कता है ये दिल,
                             तेरा नाम लेकर, मुझ को जीवन देता है…

साँसों की जो धुन चल रही है,
गीत तुम्हारा बन, बज रही है…

                            याद आए तुम्हारा प्यारा,
                            ये सवाल ही नही उठता…

जो याद मे चले जाओ तुम,
वो मेरा प्यार नही हो सकता…

                        जब तक मैं ज़िंदा हूँ जहाँ मे,
                        मुझमे ही ज़िंदा हो तुम…

ये अहसास ही मुझे कभी मरने नही देता,

हमने अपना रिश्त, खूब निभाया…

वादे न तुमने किये,
न मैने किए,

बिन कहे, इन वादों को,
निभाने का समय आया,
दोनो ने, दिल-जान से निभाया…

बिन कसमों के, बिन वादों के,
हमने अपना रिश्ता, खूब निभाया…

कुछ कह कर,  कुछ न कह कर,
कुछ समझकर,  कुछ समझाकर,

हमने अपनी बातों,
को एक ही पाया…

मेरी तन्हाईयों और गमों को,
कुछ सुन कर, कुछ बिना सुने,
तुमने खूब हटाया…

बिन कहे-बिन सुने,
दूर-दूर हम भले,

क्या सोचते है,
क्या करते है हम,

जब पूछा, एक-दूजे से,
उत्तर, हमने  एक ही पाया…

हमने एक-दूजे को,
जितना जाना सच ही जाना…

इसलिए,
हमने अपना रिश्ता खूब निभाया…

 

~ मैं नदी थी ~

मैं नदी थी
प्यासी सी
तुम सागर से
मिलने चली थी

मिलकर सागर मे ये जाना

मैं ही अकेली, प्यासी नही थी
सागर तुम भी तो, कुछ प्यासे थे

विशाल हृदय के तुम स्वामी
कुछ तो तुम भी खाली थे

मिलती हो मुझ जैसी
सौ नदियाँ तुमसे, पर
मेरी भी प्रतीक्षा, करते थे

शांत-गंभीर और परिपक्व
तुम सदा ही दिखाते थे

कितने चंचल-कोमल
तन-मन के हो स्वामी

मिलकर तुम सागर मे, ये जाना

अथाह जल तुम्हारे अंदर
अपर सीमा के तुम स्वामी

तुम भी थे, कुछ प्यासे-प्यासे
राह मेरी भी, ताकते थे

मीठे-सादे और निर्मल जल की
चाह तुम्हे भी रहती थी

मिलकर तुम सागर मे ये जाना

तुममे मिलती हों
कयी नदियाँ मुझ जैसी
पर प्यास तुम्हारी भी
बुझती नही थी

तुम संग मिलकर
अपने रूप को खोती
तुम्हारा खारापन भी अपनाती

अपनी प्यास बुझाने
तुम्हे मीठी कर जाने

तृप्ति देने और पाने ख़ातिर
हर बार तुमसे ही, मिलने आती हूँ

तुम्हारा खारा ही स्वाद सही
पर तुममे ही तृष्णा पति हूँ

 

( तूफ़ानों से लड़ने वाले )

तूफ़ानों से लड़ने वाले,
हवा के झोको से नही डरते…

इन्सान को तलाशने वाले,
परछाईयों के पीछे, भगा नही करते…

यादें जब हो जाए हावी, आज पर,
उन यादों को जीवन मे, लाया नही करते…

जो तुम तक  आने की, न चाह रखे,
उस तक जाकर, अपने को सताया नही करते…

जो खुद को न पहचान सके,
उसके पीछे अपनी, पहचान  छुपाया नही करते…

तूफ़ानों से लड़ने वाले,
हवा के झोको से नही डरते…

तेरे इंतज़ार मे…

हम तेरे इंतज़ार के आदि है,
ये जानकार तुम,
ना जाने कब तक इंतज़ार कारवाओगे?
इस इंतज़ार मे ही जीना है,
किस्मत हमारी.
ये मानकर तुम,
ता उम्र हमको सताओगे,
अब नही है शिकवा,
इस इंतज़ार से,
के जीना खुशी से है,
तेरे इंतज़ार मे…

 

..न हॅसना है, न रोना है..

चाहे देखें तुम्हारी जादूगरी,
चाहे  देखें तुम्हारी बेरूख़ी,
हमे बस अपने ही, बस मे रहना है…
न हॅसना है, न रोना है,
दिखना है, तो खुश दिखना है…

 

न चाहे मन ये मेरा, हँसने को, तो भी,
आँसू नही दिखना है,
दुनिया मे जो जीना है…

 

किसी को क्या बताए, दर्द है दिल मे,
दावा देने की कोशिश करेंगे,
वो अपने, जिन्होने दर्द दिया है…

दुनिया जी रही है,
अपनी ही खुशियों मे,
दर्द मे जो जीना है,
बस हमे ही जीना है…

दुनिया कहती है हंसों,
जब वो हँसे,
जो दर्द से रो रहा है,
न दिखता है वो किसी को…

न फ़ुरसत है किसी अपने को,
हमारे आँसू जो पोंछे,
जो जीना है तो,
उनकी खुशियों मे जीना है…

सबके अपने फसाने है,
सबके अपने बहाने है,
जो दावा बने इस दिल की,
वो मुझको ही बनाना है…

 रो रो कर बहुत
अब हमने ये माना है
दर्द जो मिला है मुझको,
उसे मुझको ही सहना है,
ना हॅसना है, ना रोना है,
दिखना है, तो खुश दिखना है…

 

रूठों यूँ ना हमसे

रूठों यूँ ना हमसे,
ना जी पाएँगे
हँस के…

सज़ा यूँ ना दो हमे,
आँसू भी ना गिरे
पलक से…

राह देखते है तुम्हारी,
कुछ इस तरह 
हम कब से…

आँसू जो आए पालक पे,
तो धुंधला जाओगे हमसे

जो झपकेंगी पलकें,
ना चल दो तुम
पलट के…

शिकवा हो जो तुमको,
कह भी दो
अब हमसे…

चुप रह कर और छुपकर,
यूँ ना जीने दो हमे
तड़प के…

जाने हो जो दिल की,
हर एक बात
माफ़ भी कर दो हमे…

 

स्त्री की परीक्षा लेनी हो…

हर बार क्यों लक्षमण रेखा खिचाती है?
हर बार क्यों अग्नि परीक्षा होती है?

जब राम ही नही है आज यहाँ?
फिर सीता की इच्छा क्यों होती है?

हर बार जब स्त्री की परीक्षा लेनी हो
वो राम का रूप क्यों धरता है?

याद रखे हर वो पुरुष
जो सीता की इच्छा रखता है
राम भी तुम, लक्षमण भी तुम और रावण भी तुम
तुम ही  संरक्षक  और  भक्षक भी तुम

फिर सीता का दोष ही क्यों दिखता है?

जो बच गयी हर परीक्षा से वो सीता थी…
आम नारी नही…
वो भी…
दूजी  परीक्षा मे, धरती मे समा गयी…

 

आज जब तुम,  राम ना  बन सकते हो
फिर सीता की परीक्षा क्यों लेते हो?

मैं अधूरी हूँ, पूरी कर जाओ

मेरी आँखों के आँसू आज थमते नही है
ये सिसकियाँ मेरी रुकती नही है
ना जाने क्या बात हुई आज की
हम जीते नही मरने लगे है

भोर होते ही यूँ लग रहा था
आज कुछ कमी सी है
दर्द था जो दिल मे कहीं छुपा हुआ
आज उभर कर आ ही गया

ना जाने आज ये क्यों हुआ
पर आज कुछ गॅमी सी है
भूल गयी थी जिन बातों को
समय संग आगे चल पड़ी  थी

वो समय आज फिर रुक गया
मैने  जो तिथि आज देख ली

हृदय वेदना से भर गया
जो दर्द तन मे हो रहा था
वो मन के घावों की याद दे गया

भूल गयी थी आज  की तिथि
जो मुझे “माँ” नाम दे सकती थी

गुज़र गये यूँ महीने नौ
जो तुम होते तो,
मेरे आँचल मे भी एक तस्वीर उभर सकती थी

जो ना याद रखे कोई तुम्हे
मेरा दिल तुम्हे याद करता है

मुझे जो छोड़ गये हो अधूरा
एक बार फिर से आ जाओ

तुमसे वादा करती हूँ
तुम्हारा पूरा ध्यान रखूँगी
इस बार कोई ना ग़लती करूँगी

मिट भी जाऊ, तो भी तुम्हे लाकर रहूंगी

वो दर्द जो मैं न सहा, वो ख़ुशी जो मुझे न मिली

आकर वो मुझे दे जाओ

मेरी सुनी गोद पड़ी है
राह तुम्हारी देख रही है
मेरी वेदना को सुन जाओ
मैं अधूरी  हूँ ,पूरी कर जाओ

एक बार तुम आ जाओ…
 

आज फिर मन उदास है,

आज फिर मन उदास है,
कोई अपना नही पास है…

              चल रही हूँ जिन रहो मे,
              कभी फूल है कभी काँटे है…

काँटों से दामन छलनि हो जाए,
पर फूलों की मुझे आस है…

              रात के आँधियारों से डर क्या मुझे, 
              धूप की तपन की आदत है मुझे…
 
बारीशों मे भी जिसने जलना सीखा,
तूफ़ानों से उसे कुछ आस है…

             परयों से डर क्या मुझे,
             डर  तो अपने आप से है..

ख़्वाहिश है…

तुमसे ज़्यादा और ज़्यादा पाने की और तुम्हे देने ख़्वाहिश है
तुम्हारी बाहों मे जीने और मरने की ख़्वाहिश है
तुम जहाँ ले चलो, आँखे बंद करके साथ, चलाने की ख़्वाहिश है

तुम ना बोलो जो, वो शब्द बनाने की ख़्वाहिश है
तुम जो महसूस करो, वो खुशी बनाने की ख़्वाहिश है
ज़िंदगी भर ना सही, चार कदम ही सही, साथ चलाने की ख़्वाहिश है

Published in: on April 27, 2009 at 8:02 PM Leave a Comment
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बस एक मैं ही जानू हूँ

 
जो रिश्ता है मेरा उनसे
कभी दर्द बनता है
कभी दावा भी बनता है
जिसे बस एक मैं ही जानू हूँ

कोई पगली कहता है
कोई दीवानी  समझता है
जो मोहोब्बत मे मिले है नाम मुझे
उसे बस एक मैं ही ज़ानू हूँ

मोहब्बत के एहसाँसों की बस एक ही कहानी है
कभी मैं दीवानी हूँ कभी दुनिया बेगानी है
जो लोग कहते है मेरी आँखों मे आँसू है
तू समझे तो ये अनमोल मोती है
नही तो दरिया का पानी है

तू दूर हूँ मुझसे,फिर भी पास हूँ मैं तेरे
जो पास हो जाए तू, मुझे मेरा वज़ूद मिले
मैं कैसे जी रही हूँ हर पल बस मैं ही जानू हूँ
जो तू जाने तो मेरी जन्नत हो
न जाने तो मेरी किस्मत हो

For Me-You…

The grace of god is you

The treasure of my life is you

The best thing about me is you

I am blessed and gifted with you

I am the luckiest person in the world just because of you…

                                                  *********

If  there is word exist like

Hope

Faith

Trust

Believe

Love

For me just because of you…

Published in: on April 15, 2009 at 2:03 PM Leave a Comment
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Do opposites attract?

I find this topic on TOI

While attraction is enough to bring two people close to each other, what happens when they discover each other’s personality traits – does it lead to a dent in the relationship or do these minor differences help the couple to complete each other? Do couples who are completely opposite to each other make a better match in the long run? Can a relationship survive personality differences? Or is it wise to select a partner who is similar to you?

My Views on this : -


I don’t think so that attraction is enough to bring two people close to each other. Though they attract towards each other for some time but after knowing each other attitude, ideas towards life, behavior towards situations, thoughts towards any thing, they can easily judge that they are totally different from each other but they don’t want to accept it because they are in love. But when you go for personal space and then even if a single issue goes against your thinking then it turns into anger and then you quarrel and fight often. In this type of situations a healthy n happy relationship is not possible for long term. Because after some time they are unable to understand that why this person(he/she) is behaving like this and why he/she is not thinking in same manner he/she does. In this situation they gets frustrated.


Although some people gives some good and scientific example that :- According to Science “Opposite poles attracts each other and ALL objects attract each other with a force of gravitational attraction”… But one more thing is true that is :- When distance become too far and opposites cross the certain limits that time atraction and gravitational force become Zero… This is also proved by Science. Correct…So when all things crossed the limit that time any emotional and scientific theory goes wrong.


If the differences are minor then the couple can complete each other by overtaking or being responsible for other person’s attitude and they can try to understand each other. Couples who are completely opposite to each other they never make a better match in the long run. Relationship can’t survive personality differences. That is why… it is wise to select a partner who is similar to you,in mental level and maturity level too. His/her perception towards life and lifestyle should be same. Only that time a relationship will be happy and healthy for long run.

कृपया अपने जूते बाहर उतरे !

                                                          कृपया आपने जूते बाहर उतरे !


ये बात हम कब से समझते और समझाते आए है की,  “कृपयाअपने जूते बाहर उतारे “!
पर इतनी सीधी सी बात ना हम किसी को समझा पाए और ना ही कोई समझ पाया!
शायद समझ  का फेर हो गया?  चाहे स्वच्छता की बात हो या सुंदरता की या फिर
 घर की सजावट की, जूते केवल पैरों मे ही सुंदर  और शालीन लगते है!
कितने ही कीमती हो या सस्ते पैरों की शोभा पैरों मे ही भाती है, कही और नही!
 ना ही हम इन्हे हाथों मे पहन सकते है ना ही सिर का ताज बना सकते है!
 
पैरों  से  उतरे और बस महाभारत मचा देते है!  सुधरे को बिगाड़ना हो या बिगड़े को सुधारना हो
या होश ठिकाने लगाना हो, पैरों की ये शोभा अच्छे अच्छों की शोभा मे चार चाँद लगा देती है!
इनकी महिमा मंडित करने की आवश्यकता नही है, ये वो हथियार है जो बिना आवाज़ के चलता
है और इसका निशाना सही जगह लगे या ना लगे इसके वार की आवाज़ चारों तरफ गूँजती है और
घाव सालों तक हरा रहता है! हर दर्द का मलहम और ज्खम का इलाज कहा जाने वाला  समय तक,
इस घाव को नही भर सकता कभी सुना करते थे की यहाँ बातों के जूते चले, वहाँ बातों के जूते चले !
बातों बातों मे ही जूते मारने की बात से ही, सभी के होश उड़ जाते थे! अब तो वो समय आ गया है,
जब लोग भारी सभा मे भी जूता मारने का कोई भी मौका  नही छोड़ते है, इसे सबसे अच्छा ज़रिया मानते है
अपनी बात रखने का ! जितनी बड़ी महफ़िल उतना तगड़ा जूता ! जितना बड़ा आदमी जूता खाए, उतना
बड़ा नाम जूता मारने वाले का नाम और शोहरत भी ! शोहरत पाने की चाह मे अब ये एक आसान रास्ता
बन गया है !

 महफिलें लगाने वाले और ख़तरों से खेलने वाले  अब थोड़ा सतर्क हो जाएँ, वो लोग भी जिन्होने
जिंदगी भर  बातों के जूते चलाएँ है, वो दिन अब दूर नही,जब किसी दिन आपसे चिड़ा हुआ कोई
आम या खास आदमी आपकी तरफ के जुटा फेंक दे ! अपनी इज़्ज़त अगर बचा कर रखनी है,
तो पुरानी बातों पर ध्यान दे और खुद भी अपना जूता बाहर रखे और दूसरों से भी उनका
जूता बाहर रखने को कहें ! अब, लगता है सब ये बात आसानी से समझ  पाएँगे!

 

U Know @@@

 

You are the color of my blossom

You are the fragrance of my blossom

You are the the truth of my life

You are the faith of my life

@@@


You are the aura of my soul

You are the strength of my soul

You are the magic of my life

You are the destiny of my life

@@@

You are the joy of my heart

You are the song of my heart

You are the worth of my life

You are the love of my life

@@@


Published in: on April 7, 2009 at 2:14 PM Comments Off
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I know why Life is like this…

 

 

I know why Life is like this…

Whenever it is Empty, I realized the importance of  Plenty…

Whenever I Cry, I realized the importance of  Smile…

                                                        *********

Whenever I don’t get those things which I Need a lot …

That time I realized the importance of  Begging…

                                                      *********

Whenever It doesn’t Adopt me…

That time I realized the importance of  Compromise…

                                                     *********

This is Life & It should be like this…


 

Long run relationship…

  

I found this topic on TOI  :-

While attraction is enough to bring two people close to each other, what happens when they discover each other’s personality traits – does it lead to a dent in the relationship or do these minor differences help the couple to complete each other? Do couples who are completely opposite to each other make a better match in the long run? Can a relationship survive personality differences? Or is it wise to select a partner who is similar to you? 

Here is my views :-

I don’t think so that attraction is enough to bring two people close to each other. Though they attracted towards each other for some time but after knowing each other attitude, ideas towards life, behavior towards situations, thoughts towards any thing or any point, they can easily judge that they are totally different from each other but they don’t want to accept it, if they are in love. But after some time they realize that it was only affection of opposite sex, nothing else. In this type of situations a healthy and happy relationship is not possible for long term. Because after some time they are unable to understand that why this person (he/she) is behaving like this and why he/she is not thinking in the same manner as he/she does. In this situation they gets frustrated and this kind of relationship gives fight, tension, frustration and guilt only.

In this situation it is advisable that happily apart from each other, pray good future for each other, when ever he/she wants your favour always try best for him/her and keep contact as a good and faithful friend.

If the differences are minor then only couple can complete each other by overtaking or being responsible for other person’s attitude and they can try to understand each other. Because it is true that no one is prefect , no one has all the good qualities , no one is ideal . Every body has some positive things and some negative things . You are the person who can see the positive side of that person and try to overcome negative side. It is the matter of vision. But yes some time it is true that, few person has 80% or 90% good qualities that time he/she should be really Ideal, Ideal for any body and in any situation, but after all he/she is a human being, so some bad qualities must be inside him/her . So leave that bad part always.

Couples who are completely opposite to each other they never make a better match in the long run. Relationship can’t survive personality differences. That is why… it is wise to select a partner who is similar to you in mental level and maturity level too. His/her perception towards life and lifestyle should be same. Only that time a relationship will be happy and healthy for long run.

Published in: on at 1:43 PM Comments Off
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What is a Life?

 

What is a Life?

Die for life?

Or Live for life?

Beg for life?

Or Fight for life?

Cry for life?

Or Smile for life?

Adjust with life?

Or Adopt with life?

If it is a matter of Vision?

It Surprises me every time…

Some time, It’s Plenty…

But…It’s Empty…

Some time, It gives me all I Need…

But…It Doesn’t give me all I Begged…

Some time, It gives me Smile I Asked for…

But…It Doesn’t give me Smiles which I Cried for…

Some time, I Compromised when Possible …

But… it Never Compromised at all …

If this is Life…

Why is it like this???

Published in: on March 31, 2009 at 10:02 PM Comments Off
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हर शब्द कहने के पहले , बहुत बार सोचा…

हर शब्द कहने के पहले , बहुत बार सोचा…
हर कदम उठाने के पहले , बहुत बार रोका…

हर धड़कन सुनाने के पहले , बहुत बार सोचा…
हर सपना सजाने के पहले , बहुत बार तोड़ा…

हर रंग भरने के पहले , बहुत बार बेरंग किया…
हर सांस लेने के पहले , बहुत बार दम को रोका…

हर पल जीने के लिए , बहुत पल को खोया…
हर हँसी दिखानेके पहले , बहुत बार रोया…

हर मदहोशी दिखाने के पहले , बहुत बार होश खोया…
हर चैन पाने के पहले , बहुत बार बैचेनी को पाया…
 
हर अरमान जगाने के पहले , बहुत बार अरमान छोड़े…
हर तरफ तुमको पाने के पहले , बहुत बार खुद को खोया…

हर शब्द कहने के पहले , बहुत बार सोचा…
हर कदम उठाने के पहले , बहुत बार रोका…

वो शब्दों की बात करता है…

वो कहता है, तुम अपना प्यार शब्दों में बयां करती हो कैसे ?

वो शब्दों की बात करता है …

जो दिल में धड़कता है , सांसों में बसता है ,
जी रही हूँ , बस उसका नाम लेकर ,
मरना भी है , बस उसका नाम लेकर ,

जो आँचल मे समा जाए , वो प्यार तो कम है ,
जो शब्दों मे आ जाए वो , वो प्यार भी कम है ,

 वो शब्दों की  बात करता है…
जो दिल में धड़कता है , सांसों में बसता है ,

मारना नही, जीना सिखाया है…

तुमसे जो जाना है , हमने वो माना है….

तुम वो हो जिसने सुनना नही, समझना सिखाया है…
तुम वो हो जिसने देखना नही, महसूस करना सिखाया है…

तुम वो हो जिसने डरना नही, लड़ना सिखाया है…
तुम वो हो जिसने खोना नही ,पाना सिखाया है…

तुम वो हो  जिसने  हारना नही , जीतना सिखाया है…
तुम वो हो जिसने भूलना नही, याद रखना सिखाया है…

तुम वो हो जिसने रोते को , हॅसना सिखाया है…
तुम वो हो जिसने भटके को , रास्ता दिखाया है…

तुमसे जो जाना है , हमने वो  माना है….

तुम वो हो जिसने भवँर मे डूबना नही, तैरना सिखाया है…
तुम वो हो जिसने खुद को मिटाना नही , पाना सिखाया है…

तुम वो हो जिसने धूप मे भी , तपन को सहना सिखाया है…
तुम वो हो जिसने काँटों मे भी , चलना सिखाया है…

तुम वो हो जिसने अंधेरों को भी, रौशन करना सिखाया है…
तुम वो हो जिसने तूफ़ानो को भी, बेबस करना सिखाया  है…

तुम वो हो जिसने बुझती लौ को भी, जलना सिखाया है…
तुम वो हो जिसने मारना नही, जीना सिखाया है…

तुमसे जो जाना है , हमने वो माना है….

आज़ादी के मायने

सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा…स्वतंतरा दिवस की एकसठवीं सालगिरह पर,सवतंतरा देश के समस्त निवासियों को हार्दिक बधाई!हमे गर्व है की हम हिन्दुस्तानी है! इस गर्व के साथ ही बहुत सारे प्रश्न है!एक आज़ादी के बहुत सारे पहलूं है! हर किसी के लिए आज़ादी का मतलब अलग-अलग है!किसी के लिए यह केवल आज़ादी है!आज़ादीमज़ा करने की,अपने मान का करने की,घूमने की,बोलने की और ना जाने किस-किस की!  आज के समय मे स्वतंत्रता से जुड़े मेरे मान मे अनेक सवाल है!जो एक आम आदमी के मान के सवाल है,जिनके उत्तर खोजने को मेरा मान करता है! 
आज़ादी कैसी? कौन सी? किस की? किस के लिए? कितनी आज़ादी? आज़ादी कहाँ तक? कब तक? इस आज़ादी को बचाए रखने के लिए हमे अभी और भी लड़ईयाँ लड़नी है! 
वो लड़ईयाँ है गंदी राजनीति से, आतंक से,भ्रष्टाचार से, आर्थिक कमज़ोरी से,बेरोज़गारी से,ग़रीबी से,भुकमरी से,समाज़ मे फैली बुराईयों से,सबसे महत्वपूर्ण अपने आप से, 
अपनी सोच से,अपनी हरकतों सेक्योंकि आज हम आज़ादी का सदूपयोग नही वरण केवल भोग कर रहे है! भटके हुए हैआज़ादी का ग़लत इस्तेमाल कर रहे है!जिसे मिली है और जो उपयोग का सकते है,वो मान चाहा उपयोग कर रहे है,नेता,राजनेता,पुलिस,अधिकारी,उचे पद मे बैठे लोग,अब तो मीडिया भी जिसे जनता की आवाज़  माना जाता था!  सब आज़ादी का अपनी तरह से उपभोग कर रहे है!कैसे?तो कुछ प्रश्नों पर ज़रा गौर कीजिए - 

वादी को जलता देखने की आज़ादी - पिछले माह से धरती का स्वर्ग कहे जाने वाली वादी को जलता,देखने की आज़ादी!हमारी आज की स्वतंत्रता समारोह की खुशियों पर सबसे बड़ा  सवाल है, जिसके लिए आज़ादी,अमन,शांति की बात करते है,अपना कहाले है उसे ही सुलगा रहे है! 

मंहगाई की आज़ादी -

पिछले  नौ माह से माहगाई लगातार बढ़ रही है!पिछले लगातार दो हफ्तों से वा अपने चरम पर याने १२% के ऊपर चल रही है!यह मंहगाई की आज़ादी है!  आम जनता का क्या? वो भूक की और लाचारी की आज़ादी मनाएँगे! 

वेतन बड़ाने की आज़ादी - चुनावों के मद्देनज़र केंद्रीय कर्मचारियों का वेतन बड़ाने की आज़ादीआम आदमी और देश को अन्ना देने वाला किसान भले ही भूकों मारे,उसकी चिंता 
कहाँ किसी को!वोट बॅंक  के लिए ग़रीब,मज़बूर किसान कहाँ कम आएगा? 

सैनिकों को कोई रियायत ना देने की आज़ादी - छठे वेतन मान मे उच्च अधिकारियों का वेतन तो बड़ा दिया गया है,पर सीने मे गोली खाने वेल सैनिक को जो वेतन मान दिया  गया है, वह चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के बराबर है!हमारे और देश के लिए जान पर खेलने वेल की कीमत इतनी ही है? 

राष्ट्रीय सम्मान ना देने की आज़ादी - जब मानेक शौ की तरह के महान इंसान को राष्ट्रीय सम्मान देने का फ़ैसला उनके संस्कार के बाद किया गया तब एक अड़ना सा सैनिक 
अपने लिए क्या अपेक्षा रख सकता है?देश के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या होगी? 

आयुषी को आज़ादी - 

आयुषी के  नन्हे से जीवन को तार-तार होता देखने की आज़ादी!ये है मीडिया की आज़ादी जो काबी किसी को अपने सामने जला देती है,तो कभी किसी 
को चैन से बँधा देखकर फोटो लेने की आज़ादी का जशन मानती है! 

डाक्टर्स को आज़ादी - 

कही किसी डाक्टर को आज़ादी है की वो किसी की भी किडनी, खून निकाल ले!तो कही ८०% गावों मे  डाकटर्स को कम ना करने की आज़ादी है,तो 
कही ९०% गावों मे दवाईयाँ ना बताने की आज़ादी है! 

नोट उड़ाने की आज़ादी - 

संसद जैसे गरिमामय स्थान मे,आम ग़रीब जनता के खून पसीने की कमाई को सरेआम उडकी आज़ादी!क्या इतने रुपयों से देश के ग़रीब को भोजन
मिल पता!हमारे देश की जनता जहाँ दिन की न्यूनतम मज़दूरी नही कमा पाती,वाहा यू रुपये उड़ाने की आज़ादी?

धमाके करने की आज़ादी - 

अपनी आज़ादी को बरकरार रखने के लिए,हम जगह -जगह धमाकों को होने की आज़ादी देते है!फिर उन्ही नेताऊ को,उसी पद मे पुनः बैठते है, ताकि वो बार - बार इस तरह से आज़ादी का मज़ाक उड़ाए और मनमानी करे.!

जनता को न्याय की आज़ादी -

आज़ फिर से सदियों पूरना,न्याय करने का तरीका वापस  गया है,जहाँ लोग आँख के बदले आँख,खून के बदले खून लेने को तैयार है और पुलिस-प्रशशणहाथ बाँध कर देखता है!ये न्याय की आज़ादी है!वर्दी वालों को आराम करने की आज़ादी!

प्रतिमा लगाने की आज़ादी 

दिवस के शुभ अवसर पर संसद मे भगत सींग प्रतिमा लगाने की सुधा बसठवे साल मे आई,वो भी शायद इसलिए की उन पर फ़िल्मे बन गयी है!
पर उनके साथ उनके जीतने ही महान,देश के लिए शहीद हुए,सुखदेव और राजगुरु को याद नही किया गयावही दूसरी ओर दंगों और धमाको के प्रदेश मे,स्वतन्त्र का जश्न मनाने,अमर शहीदों के नही वरण,मुख्य मंत्री जी के काट-औटलगाए गये!शहीदों से इन्हे क्या मतलब?देश तो इन्होने ही आज़ाद करवाया है,और आज जो शांति का माहौल है,प्रदेश मे,उसकेज़िम्मेदार भी तो यही है!इसलिए इनके पोस्टर ही लगाने चाहिए आज़ादी के दिनदूसरी ओर अपने जीते जी,अपने को महान और ईश्वर तुलया बटाने वाली मुख्यमंत्री ने जगह-जगहआपनी मूर्तियाँ लगवान दी और इस हेतु उस आदमी के नाम की दलील दी जा रही है जो अब इस दुनिया मे ही नही है!तो क्या इन्हे ये भी भरोसा नही है की जनता इन्हे,इनके कामोसे याद रखेगी?शायद नही इसलिए तो अपनी प्रतिमा लगवा रहीं है! दूसरी ओर हमारे देश मे चापलूसों की इतनी बड़ी लाईन है की,वो नेताओ को देवी-देवताओ का रूप बनाकर,धामिकता का मज़ाक उड़ा रहे है!ये हमारे नेताओ और चापलूसों की आज़ादी है!

आधुनिकता की आँधी दौड़ मे शामिल होने की आज़ादी-

ये दौड़ हम पर ऐसी सवर है की आज हर आदमी आखन बंद किए अंधानुकरण कर रहा है!जिन चीज़ों से कोई लेना -देना नही,जिनकी समझ नही उन्हे केवल अपनी पहचान बनाने के लिए कुच्छ भी कर रहा है!

चारों और आज़ादी ही आज़ादी 

 कम कपड़े हो,दोस्ती के नाम पर चिपकाना हो,किसी की भी निज़ी जिंदगी को,किसी भी हद तक सार्वजनिक करना हो,मित्रों के साथ ग़लत 
तस्वीरे लेना हो,अधिक जानकारी के चलते,ग़लत बातों को सफाई देते हुए,आसानी से करना हो,टी.वी मे चने या नाम कमाने के लिए कुछ भी करना हो!कुछ भी करने के लिए हम आज़ाद है!

कुछ मज़ेदार आज़डियान भी है जो मुझे यूँ लगती है -

कुछ भी सीरियल्स बनाने की आज़ादी- 

हम किस तरह के सीरियल्स आजकल देख रहे है,चाहे कॉमेडी के नाम हो, जिनमे दे अर्थों की गंदी कॉमेडी की जाती है!सास-बहू ये सीरियल्स हो,इन्हे देख -देख कर घर मे बैठी औरतें अपने को,खुद से जुड़ा समझकर,कहीं ना कहीं इन्ही की नकल करके,अपने रिश्तों को शक की आग मे झोक कर बर्बाद कर रहीहै!ये उनकी आज़ादी है,झूती दुनिया को सच मानने की! माता-पिता की चाहत मे छोटे छोटे बच्चों को कड़ी मेहनत करा कर, मंच मे बड़ों की तरह हरकतें करने की और कॉमेंट्स सुनने की आज़ादी!
जिससे आम-ग़रीब बच्चे इसी चाहत मे पदाई-लिखाई छोड़कर नाच-गाना शुरू कर देते है दिन-रात उन्ही ४,५ सितारों की,ज़िंदगी की कहानियाँ सुनते रहना, जैसे देश मे बस यही परिवार है,इन्ही से सारे संस्कार है,इन्ही को लोग आदर्श मान लेते है! वे ये भूल जाते है की ये सितारे,ये सब केवल अपनी कमाई के लिए ही कर रहे है!क्या इनकी हरकतों से आपको कोई फ़ायदा हो रहा है?
क्या ये अपनी कमाई आपको दे रहे है?क्या उनकी करतूतों से आपका भला हो रहा है?नही ना फिर भी इनको अपना आदर्श मानना आपकी आज़ादी है! अगर ह्म चाहे तो,अगर सब कोशिश करे तो इस ”शायद“को हम ”ज़रूर” मे बदल सकते है! आवश्यकता है तो मिलकर कम करने की और सोच को परिष्करत करने की!
 

            तो आज़ादी ऐसी है आज!हम इन बासठ सालों मे कहाँ से कहाँ आ गये है?जब तक हम इन बातों पर गौर नही करेंगे  और आने वाली नयी पीडी को नही समझाएँगे, हम आज़ादी का इसी तरह उपभोग करते रहेंगे!सोचने वाली बात है,
चीन जैसा देश जो अपनी आबादी के बावजूद,अपनी सन्स्क्रति को बचाते हुए,द्रन आर्थिक इस्थिति मे मज़बूती के साथ खड़ा है 
और पूरी दुनिया से ये मनवा ही लिया की वो कितना आगे है! क्या हम भी अपनी सन्स्क्रति को धरोहर के रूप मे,आने वाली पीडियों को देकर,आर्थिक और वैचारिक रूप से मज़बूत नही हो सकते?क्या आज़ादी को हम यू ही ख़तरे मे दल देंगे?क्या आज़ड़ी के बदते सालों मे हमारे भारत का गौरावमय इतिहास मिटाता  जाएगा शायद नही,

          “जब हम बदलेंगे तो हिन्दुस्तान बदलेगा,हम चाहेंगे तो नया सूरज चमकेगा“

फिसड्डी शिक्षक

 पुणे महाराष्ट्र मे सेट के नतीज़े घोषित हो चुके है, जो हमे सोचने पेर मज़बूर करते है, २१०० विद्यार्थियों मे से केवल४५ पास! ये नतीज़े हमे अचंभे  मे डालने वाले है! क्योकि इस परीक्षा मे बैठने वाले विद्यार्थी पी.जीकिए हुए और उच्च शिक्षित लोग है! फिर नतीज़े ऐसे क्यो? सोचने वाली बात है  की इनके लिए ज़िम्मेदार कौन?ये हाल आज का नही है पिछले वर्षो से इसी प्रकार के नतीज़े प्राप्त हो रहे है! मेरे विचार से इनके लिए जीतने  ज़िम्मेदार शिक्षक है, उतना ही ज़िम्मेदार शिक्षा प्राद्दाली भी है! आज शिक्षा के व्यवसाय मे, व्यक्ति अपनी इच्छा से नही बल्कि मज़बूरी से आता है!शिक्षा प्रदान करना उसकी सोच नही है! जो बाकी नौकरियों मे नही जा पाते,वो शिक्षक बनाने  जाते है! तो परीक्षा भी बेमन से देते है!

इसके पीछे काई कारण है! आज केवल शिक्षक ही ऐसा पद हैजिसमे केवल नाम की महत्ता रह गयी है काम की नहीशिक्षक के नाम पर संविदा  शिक्षकतो कही गुरुजी के नाम पर शिक्षको की भरती की जाती है वो भी मामूली तनख़्वाह पर और ये तनख़्वाह उसे महीनो  तक नही मिलती! अपनी दुर्दशा पर रोते शिक्षक कहाँ से दूसरों को शिक्षा देंगे!  उन्हे धरने पर बैठना पड़ता है, तो कही लाठी और ख़ूसें खाने पड़ते है! कोई भी मदद नही  मिलती!अब तो शिक्षक पद का सम्मान भी कम हो चुका है!किसी समय मे पूजे जाने वाले शिक्षक आज एक नमस्ते को तरसते है!

जहाँ प्रोफेशनल डिग्री पाने के लिए थोक के भाव कालेज खुल गये है,जिनमे कितने भी कम अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी बड़े रुपयो की नौकरी  पाने  के साथ ही साथ विदेश यात्रा भी कर लेता है!वहाँ मेहनत से पारम्परिक विषयो को पड़ने वालों को कोई नौकरी नही!अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति किस मानसिकता से परीक्षा देगा?परीक्षा देना भी ऐसे लोगों को भारी पड़ता है

इस गिरावट का कारण केवल यह नही है!आज आदमी के दिल मे रुपये कमाने के नये-नये और सस्ते रास्ते आते है!आज शिक्षक  बनाना पार्ट  टाइम काम माना जाने लगा हैलोग इसे साइड मे रखकर दूसरे काम करना चाहते हैइसलिए वो उस मेहनत के  साथ परीक्षा की तैयारी भी नही  करते है! नतीज़ा हमारे सामने है!पर ये सोचने वाली बात है कीअगर यही हाल रहा तो,  हम शिक्षक कहाँ से लाएँगे?हमे शिक्षकों की स्थिति सुधारने  के प्रयास पहले करने चाहिए!तब समाज़ मे और लोगों के बीच इस पद की महत्ता और सेवा भावना जाग्रत होगी और स्वेक्षा से लोग शिक्षक बनाने  को तैयार होंगे|

Published in: on June 24, 2008 at 4:10 AM Comments Off
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सोना और शुतुरमुर्ग बनना…

सोना और शुतुरमुर्ग बनना… ये  क्या बात हुई भला?आप भी यही सोच रहे होंगे की आख़िर ये दोनो मे क्या बात है?बात तो बहुत पाते  की है जी, बस नज़ारिए का फेर है!वो ऐसे की, जब हम स्कूल मे पड़ने जाते तो हमारी एक शिक्षिका हुआ करती थी, जो हम बच्चो से  मुहावरों मे बाते करती थी! जैसेतुमलोग बिना मार खाए सुधरोगे नही को वो कहती, “मार खाए धम-धम,विद्या आए छम-छमजब  बच्चे शोर मचाते और उन्हे आता देखा कर चुप हो जाते,तब वो कहतीशुतुरमुर्ग क्यों बने हो“, जब मुझे क्लास के बाहर हल्ला सुनाई दे रहा है, तो अब मूह छुपाने से क्या? अब शुतुरमुर्ग की तरह क्यों बन गये  हो! तब हम बच्चो को वो समझती भी की, शुतुरमुर्ग बहुत  डरपोक किस्म का प्राणी होता है,जब वो कोई परेशानी देखता है, याने जब कोई प्राडी उसको खाने आता है तोवो अपना मूह छुपा लेता हैभले ही पूरा शरीर दिखता रहे,वो सोचता है की उसे तो कुछ नही दिखा रहा, तो उसके शत्रु को भी वो नही दिखा रहा होगा, जबकि उसका  पूरा बड़ा शरीर दूर से ही दिखता है!जब हम ग्रहकार्या नही करते तो वो कहती,”आराम बड़ी चीज़ है मूह ढक के सोईए,किस-किस को याद  कीजे किस- किस पे रोईएयाने तुमलोग तो बाड़िया चादर तान के सो रहेहोगे, सोचा होगा सो जाओजब ग्रहकार्या करना ही नही है तो, कौन जागकर समय बेकार करे, कौन जागकर उसकी याद करे,चिंता करे,मस्त सो जाओ!कल की कल देखेंगे!

बचपन की ये बाते आब याद आती है, जब माबाप की बात ना सुननी हो, जब बीबी की किलकिल नही सुननी हो, बचे का होमवर्क ना  करवाना हो, बिज़ली का बिल नही जमा करना हो, बॅंक ना जाना हो या जब भी कोई कम नही करना होया तो चादर तान कर सो जाओ, देखते है कों कब तक चिल्लाता रहेगा? एक-दो घंटे मे तो थककर चुप होजएगा! कौन कब तक अपनी रह देखेगा किसी कम के लिए जिसकी अटकी होगी वो अपना कम खुद कर लेगा! याने जब लगे की स्थिति विकट हो रही है तोशुतुरमुर्ग बन कर अपना मूह छुपा लो, जिसको शरीर दिखता है दिखता रहे?अपना क्या जाता है? अपने पास तो सीधा सा उत्तर है, अरे मैं भूल गया या सो गया भाई! बस जिसे  सिर पीटना है पीटता रहे! अपना तो आराम भी हो गया और काम भी दूसरे आदमी ने कर दिया और क्या चाहिए? जीवन मे सुकून और  आराम!जिसका खून जलता है.जाता रहे! हमारी तो तन्द्रुस्ति बरकरार ही रही!  तो सोने का रिकार्ड बनाने की भी प्राक्टिज़ भी बहुत हो  गयी है!समारे आराम मे कोई कितना भी खलल डाले हम जगाने वालों मे से नही है! मा-बाप चिल्लाए,बीबी खीजे, बच्चे रोए हमे क्या? ज़्यादा से ज़्यादा उठ कर यही कहना है अरे, मैं तो ये कम करने  वाला था, आपने कर दिया?कोई बात नही अगली बार कर दूँगा! कौन  है ऐसा, जो हमे पिछले  कुछ ही दीनो से जनता हो और हमे कोई कम बता दे? जिसने बताया उसका कम ऐसे किया की, वो दूबारा नही    मिला! अच्छे-अच्छों के काम हमने ऐसे बनाए है की बस! सोन का एक और बहुत बड़ा फ़ायदा होता है, ना किसी का कम करना होता है, ना वो हमसे गड़बड़ होता है! ना किसी को सलाह देनी होती है, ना वो सलाह गड़बड़ होती है! दोनो ही स्थिति मे अपना ही फ़ायदा, लोग  कहते है सीधा आदमी है, किसी के मामले मे टाँग नही डालता!

मा-बाप,बीबी -बच्चों का क्या? इन्हे तो ऐसे ही जिंदगी गुजारनी है! वैसे यही लोग है जो मेरी नीद पर नज़र लगाए है!जब मैं अंगड़ाई  लेकर उठता हूँ, तो मेरी बीवी की बर नज़र मुझ पर यू पड़ती है मानो, मैं पिछले कई सालों से सो ही रहा हूँ!वो दो नज़रें मुझे यूँ देखती है  मानो मैने कोई बड़ा पाप किया है!इससे बचाने के लिए मैं दोबारा आँखे बंद करके सो जाता हूँ! एक बार फिर से सोने की कला भगवान   ने कुछ ही लोगों को दी है!मैं वो खुशकिस्मत हूँ!जो लगातार कईघंटे सो सकता हूँ!इन्ही लोगो को मेरे आराम से परेशानी है, वैसे जगाने  पर मैं इन्हे भावनात्मक रूप से डरता हूँ,ये करेंगे भी क्या डर  भी जाते है!

               आज के समय मे बचपन के ये दोनो मुहावरे ही हमारे सुखी जीवन का आधार बने हुए है!चाहे तो आप भी आज़मा कर देखिए दुनिया के सारे दुखों परेशानियों से आपको छुटकारा मिल जाएगा!

 

Published in: on June 21, 2008 at 10:59 PM Comments Off
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अंतर क्यो ?

हम सभ्य भारतीय समाज मे रहने वाले, वो संस्कारी लोग है, जो स्वयं को शिक्षित, ज्ञानवान और एक अच्छे स्तर मे रहने वाला पड़ा-लिखा वर्ग मानते है ! यह मानने के हमारे पास बहुत से कारण भी है ! हम पड़े-लिखे, डिग्रियाँ बटोरे लोग है, जिनके पास ऊचा पद, नाम, मान-सम्मान है! सामाजिक-स्तर से हम अच्छी पहुच रखते है! हमारे बच्चे पड़े लिखे है,अच्छी नौकरियों मे है, कुछ तो विदेशों मे भी है!  सत्य है, अगर आपके पास ये सब है तो समाज मे आप एक सम्मानित व्यक्ति की ज़िंदगी जीते है!

१) पर हम मे से,ऐसे कितने लोग है, जो सच मे अपनी सोच को ऊचा करने  मे कामयाब हो सके है? “ऊचा” इसलिए क्योंकि, हम सभी व्यक्तियो के लिए एक सी सोच नही रखते, वो हर व्यक्ति के अनुसार बदल जाती है|

२) हम मे से कितने लोग है, जो कुच्छ अच्छी बात सीख कर, उसे अपनी ज़िंदगी मे उतारने का प्रयास ही करते है? “प्रयास” इसलिए क्योंकि  जो सारी अच्छाई सीख जाए वो तो महान ही होगा!

३) ऐसे कितने लोग है जिनकी कथनी और करनी मे बहुत कम अंतर होता है? ”बहुत कम” इसलिए क्योंकि जिनकी कथनी और करनी मे  अंतर ना हो वो तो शायद आम इंसान ना हो!

इन सवालों के जवाब आप खुद ही खोज़ सकते है! आप पता कर सकते है की, आप जो अपने बारे मे सबको जताना चाहते है, वो आप है भी  या नही? क्या आप जो नही है, केवल वो दिखना चाह रहे है? यदि ऐसा है तो आईए एक बार विचार करें!

  • आज हम सब कहते है की लड़के-लड़कियाँ एक बराबर है, पर क्या हम ये बात मानते है? अच्छे-अच्छे पड़े-लिखे घरों मे बेटा होने  के लिए  कई तरह के प्रयास किए जाते है! दिखावे के लिए हम ये ज़रूर कहते है की, कुछ भी हो आजकल सब एक बराबर है! पर  प्रयास सबका यही  रहता है की, बेटा हो! कारण सबके अलग-अलग हो सकते है, पर चाह वही, बेटा हो!
 
  • हम कहते ज़रूर है की, “बेटी और बहू मे कोई अंतर नही” पर जब पारी आती है तब, “बहू कभी बेटी नही बन सकती” ये कहकर पल्ला झाड़ लेते है! ये प्रयास नही करते की बहू को बेटी कैसे बनाए? जब वही काम बेटी करे तो कहते है की धोखे से हो गया, सीख जाएगी! पर जब  बहू की पारी आती है तो बात बदल जाती है!

 

  • जब हम कहते है की “हमे दहेज नही चाहिए”, और दूसरे पल यह कहते है की, आपकी बेटी की सुविधा के लिए जो समान उसे  चाहिए दीजिए, और इस तरह समान की लिस्ट लंबी करने मे कसर नही छोड़ते!मन मे ये बात ज़रूर आ जाती है की, हमारा बेटा योग्य है, दहेज मिलना ही चाहिए! माँगने के तरीके ज़रूर बदल जाते है पर चाह वही की, दहेज मिले!

 

  • हम अपनी मा-बहन की रक्षा की चिंता करते है और दूसरों की बहू-बेटियों को परेशन करते है!हम अपने घर की बातों को बाहर नही  जाने देना चाहते पर, दूसरों के घरों मे ताक-झाँक करते रहते है! दूसरों को तो आदर्शों का पाठ पड़ाते है, पर खुद एक का भी पालन  नही करते! जो सीख दूसरों को देते है उसमे से एक भी नही मानते! रामायण पड़ते, सुनते और सुनाते है, पर पालन करते है  महाभारत!

 

  • हम कहते तो ज़रूर है की, दूसरों की मदद करनी चाहिए, पर जब कोई हमारे पास आता है मदद के लिए, तो हम सोचते है की हमसे  मदद ले कर ये कही आगे ना निकल जाए? और उसे मदद नही करते! पर जब हमे मदद कि ज़रूरत होती है तो,सबके पास जाते है!जब आप दूसरों की मदद नही करोगे तो कोई और क्यों आपकी मदद करेगा!

 

  • कहा जाता है की, रंग-रूप, काम-रुपये के आधार पर भेद-भाव नही बरतना चाहिए, पर एक ही घर-परिवार मे व्यक्ति के रंग-रूप  और कार्य के अनुसार भेद-भाव बरता जाता है! यह चाहे हँसी-मज़ाक मे हो या तानों के रूप मे! तब आदमी ये क्यों भूल जाता है की, उसके ही हाथ की सभी अगुलिया भी बराबर नही होती है!

 

  • विदेशी सन्स्क्रति के प्रभाव मे वहाँ का पहनावा और भाषा तो सीख जाते है, पर नियम-क़ानून, काम करने का तरीका, उन्नति के  रास्ते, सुधार के प्रयास नही सीखने की कोशिश करते!

 

  • हम विदेशों की जो बड़ाई करते है, क्या उनमे से कुछ अपने देश मे लाने की कोशिश करते है?  शायद नही, क्योंकि हम विदेशों मे  जाकर वहाँ क्या-क्या अच्छा है ये तो बहुत बताते है, पर वहाँ की एक भी अच्छी बता अपने साथ नही लाते! इसका एक अच्छा सा  उत्तर हमारे पास ज़रूर होता है, वो ये की, हमारे यहाँ के लोग कुछ नही कर सकते!  हमारे देश मे ऐसा ही रहेगा,कुछ नही बदलेगा!क्यों भाई क्या हम अपने देश मे जा कर उसी सख्ती के साथ सारे नियम-क़ानून मानते है, जैसे हम विदेशों मे पालन करते है? नही, वरण देश मे  आकर हम भी ग़लतियाँ करनी और गिनानी शुरू कर देते है! दूसरों को समझाने के बजाए हम खुद भी वही हरकते करते  है और खुश होते है की विदेश मे ये सब करने नही मिला!

 

  • दूसरों को कहते पाए जाते है की, ये करो वो करो और जब हमारी पारी आती है तो यही कहते है की, हमारे अकेले के करने से क्या  होगा? बाकी तो कोई नही कर रहा है! तब हम ये भूल जाते है की, ”बूँद-बूँद  से ही घड़ा भरता है!”

अगर हमारे विचारो मे और कार्यो मे उपरोक्त प्रकार की भिन्नता  है तो हमे अपने विचार , सोच , मन तथा कार्य को बदलने की ज़रूरत है जिससे हम सही मायनो मे शिक्षित, संस्कारी, ज्ञानवान बनकर एक अच्छे समाज का निर्माण कर पाएँगे  |

अमेरिका मे शादी सावधानी बरतें…

आज हर माता -पिता का सपना है की, उनकी बेटी के शादी अमेरिका मे बसे युवक से हो! सही भी है! क्योंकि, बेटी के भविष्य को उज्जवल देखना   कोई ग़लत बात नही है ! पर विदेशी युवक को देखकर सब ये भूल जाते है की, सामने की चमक धमक के पीछे की स्च्चाई क्या है ?  बेटी के सुख के खातिर ही सही एक बार पूरी छान – बिन कर लेनी चाहिए,क्योंकि शादी पूरी ज़िंदगी के बात होती है, ना की कुछ पलों की!  आप जिस विदेश से आए लड़के को देखने जाते है, वो मात्र दस- पंद्रह दिनों के लिए देश आते है, और कुछ ही दिनो मे कई लड़कियाँ देखते है! सुबह – दोपहर – शाम, इसी बीच किसी एक को पसंद कर लेते है, हम बेटी वाले भी सोचते है की हमरी किस्मत कितनी अच्छी है हमारी बिटिया को विदेश का लड़का मिला! लड़के के माता-पिता से मिल ही चुके रहते है, कुण्डलियां भी मिलवा ली होती है, योग्यता तो पता ही है !

सावधान यही, हम धोखा खा जाते है ! सामने सब अच्छा दिखना ही पर्याप्त नही है ! कई लड़के माता-पिता के दबाव मे, तो कई दहेज के नाम पर, तो कई केवल घर चलने के नाम पर शादी करते है! विदेश मे वो क्या कर रहे है किसी को नही पता होता है ! काई लोग यह सोचते है कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा ! पर आपको ये पता होना चाहिए की , विदेशों मे काई लड़कियों के साथ संबंध रखना , शराब पीना आम बात है ! हमारे देश मे भले ही यह अभी मेट्रो तक है पर वहाँ ये बहुत मामूली बात है ! यह बात काई बार लड़के के माता – पिता को पता होती है काई बार नही ! पर दोनो ही इस्थितियों मे परेशानी आपकी बेटी को होगी ! विदेश मे उसकी सुनने वाला कोई नही, आपको फोन पर या नेट पर वो क्या और कितना बताएगी? हम यही सोच कर खुश हो जाते है की ,वहाँ वो स्वतन्त्र है, कार चलती है, घूमती है ! किंतु कई बार केवल इतना ही पर्याप्ता नही होता,खास तौर से अगर उसने अपने मायके मे ये सब ना देखा हो,उसके मायके मे मर्यादाये हो?

विदेशों मे शादी के बाद भी इस तरह के रिशते चलते रहते है ! लड़की के विरोध करने पर उसे डाइवोर्स के लिए धमकाया जाता है ! या तो वह यह सब चुपचाप सहे या क़ानूनी लड़ाई लड़े ! ये दोनो को ही हमरे समाज़ मे बुरा माना जाता है , ख़ासतौर से लड़की के लिए ! यहा विदेशो मे भारतीय लड़के इसलिए शादी नही करते , क्योंकि उन्हे पता होता है की अगर किसी विदेशि लड़की से शादी करो तो, डाइवोर्स के समय लड़के हर चीज़ का आधा हिस्सा लड़की को देना होता है ! फिर चाहे वह तंखा हो, घर हो, बॅंक बॅलेन्स हो , बच्चो का पूरा खर्चा हो सब लड़के को देना होता है ! जबकि हमारे यहा लड़की को भारण -पोषण के नाम पर केवल ३,४ हज़ार रु महीना देना होता है ! बदनामी का टोकरा भी लड़की के सर पे रख दिया जाता है की,लड़की चरित्रहीं थी , या बुरी बहू थी ! दोनों ही मामलों मे लड़का एकदम साफ बच कर निकल जाता है ! इसलिए कई लड़के यह सोचते है की , देश मे शादी करो , यदि नही जमी तो तलाक़ दे देंगे , हमारे यहाँ तो ज़्यादा कुच्छ देना भी नही पड़ता है ! और दहेज़ मे भी मोटी रकम मिलती है !

अफ़सोस् तो तब होता है जब लड़के माता पिता और परिवार वाले भी यह बात जानते है, फिर भी चुप रहकर किसी और लड़की की ज़िंदगी खराब होने देते है ! काई बार अगर कोई रिशतेदार बताना भी चाहते है, तो हम लड़की वाले इतने खुश रहते है की इस और ध्यान ही नही देते ! या लोग कह देते है की वो लड़के की शादी नही होने देना चाहते, इसलिए कई बार बाकी लोग चुप रहते है ! तो अब ये आपकी ज़िम्मेदारी है की, आप ये पूरी जानकारी ले की कही, आपकी बेटी ग़लत जगह ना फँस जावे !

मैं ये नही कह रही की, सारे ही लड़के खराब होते है , पर हाँ, ” आपकी बेटी आपकी अपनी है, उसके जीवन को खुशहाल बनाने का जितना हक आपका है, उतना यह कर्तव्य भी है की, यह तहकीकात पूरी तरह कर ले की , कही कोई गड़बड़ तो नही? आख़िर सावधानी बरतने मे क्या हर्ज़ है ?” आख़िर यह केवल २-४ दिनो की चका- चोंध का सवाल नही है ! और ये भी ध्यान रखिए की जो रिशतेदार किसी भी शादी मे आते है, मज़ा करते है, बात बिगड़ने पर वी ही सबसे पहले उंगली उठाते है ! कही आपको तो कही बेटी को बुरा कहेंगे ! तो अच्छा है आप ही सावधानी बरते ! आख़िर ये आपकी बेटी की ज़िंदगी का सवाल है !