बहुत कोशिश की

कदमों से कदमों को, मिलाने की बहुत कोशिश की,
कभी मैं आगे बढ़ गयी, कभी तुम पीछे रह गये,

बातों को बातों से मिलने की बहुत कोशिश की,
कभी मैने कड़वी बातें कहीं, कभी तुम मीठी कह गये,

विचरों से विचारों को, मिलाने की बहुत कोशिश की,
कभी मेरे ओछे-हल्के हो गये, कभी तुम्हारे बड़े-गहरे हो गये,

मन से मन को, मिलाने की बहुत कोशिश की,
कभी मेरा मन छल गया, कभी तुम्हारा सागर सा गहरा हो गया,

“निधि” हर कदम मे, तुमसे पीछे रह गयी,
तुम हर कदम, मुझसे भारी पड़ गये…

नवयुवती

सड़क के गढ्ढों मे, डोलता हुआ, आटो चला जा रहा था,
एक स्टॉप मे, नवयुवती के चढ़ते ही, सारी नज़रे उस पर टिक गयी,

कुछ मनचलों ने, दो-चार ओछे शब्द उस पर गढ़ दिए,
जो ना बोल पा रहे थे, उनकी नज़रें ही, शब्दों को बयान कर रही थी,

थोड़ी ही दूर पर, एक बाईक, ऑटो के साथ हो ली,
माज़रा  समझते देर ना लगी, 

आटो के सामने, उन मनचलो ने, गाड़ी अड़ा दी,
चालक के, ऑटो रोकते ही, लड़ाकों ने लड़की को खीचने की कोशिश की,

ऑटो वाले ने हाथ जोड़कर लड़की से कहा,
बेटी मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ, रोज़ रोज़ के तुम्हारे इस अपमान से, मरणासन्न हो रहा हूँ,

जवान लड़के ही क्या, औरते भी तुझे साथ नही देती है,
अच्छा होता जो, तू बीमार माँ की, दावा के लिए, इनके बाप से, उधार ना लेती,

हर किसी को, तुझमे ही बुराई नज़र आती है,
क्योंकि तू, जवान सुंदर लड़की, इनकी बेटी या बहन नही है.

तुझे सब ताने मार जाते है, नज़रों से तेरा चरित्र गिरा जाते है,
इन मनचलों के, इरादों को, बुलंदी दे जाते है,

एक आवाज़ भी तेरी, तरफ नही उठती है, 
तू ,रोज़ ये अपमान,  कैसे सहती है?

लड़की ने उतरते हुए भी कुछ ना कहा,
एक क्रोध भरी नज़रों से, सबको देखा,

जो नज़रें उसे ताने मार रही थीं,
मानों धरती मे दबी जा रही थीं,

बिन कहे ही, उसकी नज़रों ने, हम सबको पानी कर दिया,
उसकी तीखी मुस्कान ने, हम सबको बेज़ुबान कर दिया

सूरज की पहली किरण

भरी धूप मे, आज ऑफीस जाते समय ही उसने सोच लिया था, शाम को घर वापस जाते समय, आज मंदिर जाऊंगी…
मंदिर मे हाथ जोड़े खड़े, मन न जाने कितनी पूरनी बातों और यादों से भर गया… आँखों से फिर कुछ आँसू गिर गये, सिर पर रखा दुपट्टा संभालते हुए, साथ ही आँसू भी पोछ लिए… पीछे से एक आवाज़ आई, चलो घर, बहुत देर हो गयी, पिछले नौ सालों से तुम यहाँ आती हो और न जाने कहाँ-कहाँ जाती हो, तुम्हे क्या मिला?

घर पहूचकर ठंडा पानी पी ही रही ही थी की, फ़ोन की घंटी बज़ उठी… एक २ दिन का बच्चा, मरणासन्न अवस्था मे, हॉस्पिटल मे पड़ा है, आना है क्या उसे देखने? पानी आधा ही छोड़कर, अपनी बात आधी-अधूरी समझाती हुई, पति को साथ चलने कह  निकल पड़ी… कितने सालों से, अपने सभी  आत्मीय लोगों को समझा रही थी, कितना इलाज करवाया, आधुनिक तकनीकों का भी सहारा लिया… शारीरिक और मानसिक तकलीफ़ के अलावा कुछ भी न मिला… अती शिक्षित, अती आधुनिक सोच वाले परिवार का हिस्सा होते हुए भी, अपनी बात, अपनी सोच से किसी को भी बदल नही पा रही थी… यहाँ तक की, हर कदम पर साथ देने वाले अपने जीवन साथी को भी समझाने मे असफल थी… नौ सालों का लंबा, एकाकी सफ़र, सब कुछ होते हुए भी कोई कमी, उसे अंदर से खोखला कर चुकी थी…

हॉस्पिटल मे पहुचते ही, जैसे बच्चे को देखा, लगा की कल, सूरज की पहली किरण भी ना देख पाएगा, पर मन से कहीं आवाज़ आई, इस माह मिली तनख़्वा अगर खर्च भी कर दूं और शायद बच्चा बच जाए, तो एक माँ को उसका बच्चा मिल जाए… जो सुख मुझे ना मिल पाया, वो इस ग़रीब को मिल जाए…उस औरत के साथ  dr. से मिलने गयी… dr. ने खर्चा बताने के पहले ही ये बात दावे से कह दी, अड़तालीस घंटे निकलना असंभव है… रुपये लगाने के पहले सौ बार विचार कर लें, वो बेचारी  ग़रीब औरत ये सुनकर ही लापता होगा यी, माँ का दिल जो था..

न जाने क्यों उसकी इक्षा शक्ति या प्यार देखकर, पति ने साथ दिया… दोनो ३दिनों तक उसके सिराहने बैठे रहे… ३दिनों बाद सूरज की पहली किरण के साथ जब उस मासूम ने आँखें खोली तो, इन्हे सब मिल गया, कई दिनों की क़ानूनी कार्यवाही के बाद आज “सूरज” आपनी माँ के आँचल मे निकला…   

तुम

तुम बहुत मीठा बोलते हो,
हर शब्द को, चाशनी मे घोलते हो,
मिशरी की तरह, रस घोलते हो,

न कड़वा बोलते हो,
न शब्दों के तीर चलाते हो,
बिन कुछ बुरा कहे ही,

मीठे शब्दों मे ही,
कड़वा सच सुनाते हो,

अब

1) पहले :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
तुम मेरे दिल तक आए,
कुछ यूँ समाए की,
दूजी, सारी दस्तकें, सारी आहटें,
मुझसे कोसों परें हो गयीं…

2) कुछ दिन पहले तक :-
बिन दस्तक, बिन आहट के,
मुझसे दूर हुए, दूर भी इतने की,
दूजी, हर दस्तक, हर आहट,
मेरे कानों मे गूंजा करती,
तुम्हारी दस्तक, तुम्हारी आहट नही,
ये कहा करती थी….

3) अब:-
ना दस्तक, ना आहट है,
ना दरवाज़े पर नज़रे टिकी है,
ना किसी आवाज़ की पुकार है,